पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४२१

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बादशाह दूती खंड २३e दिल्ली सब देखिक तुरकानू । न सुलतान केर बँदिखानू , रतनसेन देखिएँ बँदि माहाँ। ज धूप, खन पाव न छाहाँ ॥ सब राजहि बाँधे श्री दागे। जोगिनि जान राज पग लागे ॥ का सो भोग जेहि अंत न केऊ। यह दुख लेड सो गऐउ सुखदेऊ ॥ दिल्ली नार्वे में जानलु ढीली । सु3ि रौदि गाड़ेि निकस नहि ॥ ला देखि दगध दुख ताकरबहूँ क्या नहि जीड़ सो धनि से दहें जिमैजाकर बँदि अस पीठ ? पदमावति ज सुना दि पीजे.। परा अगिनि महें मान , घीज़। दौरि पा. जोगनि के परी। उठी आागि अस जोगिने जरी। पायें देहि, दुइ नैनन्ह लाऊँ। लेइ चलु तहाँ कंत जेहि ठाऊँ। जिन्ह नैनन्ह तुड देखा पी ! मोहि देखार, देहूँ बलि जीऊ । सत श्र धरम देहूँ सव तोहीं। पिछ के बात कहे ज मोहीं ॥ तृइ मोर गुरूतोरि हीं चेली। भूली फिरत पंथ जेहि मेली। दंड एक माया करु मोरे । जोगिन होड चलीं सँग तोरे ॥ सखिन्ह कहा, सुनु रानी, करह न परगट भेस । जोगी जोगधे गुपुत मन, लेइ गुरु कर उपदेस ॥ ७ । भीख लेह, जोगिनि ! फिर माँगू । अंत न पाइय किए सवाँगू ॥ यह बड़े जोग बियोग जो सहना। जेपीउ रावें तेहूँ रहना ॥ घर ही माँ रह भई उदासा। जुरी खप्पर, सिंगी साँसा रह प्रेम मन अरुझा गटा। बिरह धंधारि, अलक सिर जटा॥ नैन चक हेरे पिउ पंथा। कया जो कापर सोई कंथा ॥ (३) राज पग लागे = राजा ने प्रणाम किया। न केउ = पास में कोई न रह जाय । (यह दु:ख ) ले गएड = लेने या भोगने गया। सुखदेऊ = सुख देनेवाला तुम्हारा प्रिय। दिल्ली नावें = दिल्ली या दिल्ली इस नाम से (पृथ्वीराज रासो में किल्ली दिल्ली कथा है) । सु5ि = खूब 1 कीलो कारागार के द्वार का अर्गल । अबढ़े कया नह जीउ = अब भी मेरे होश ठिकाने नहीं । (७) माया = मया, दया । (८) फिरि माँगू = जाग्रो, और जगह घूम- कर माँगो । सवाँग = स्वाँग, नकलचाडंबर । यह बड़..सहना = वियोग का यही भारी जो सहना है बड़ा योग है । जेहूं = जैसे, ज्यों, जिस प्रकार । तेहूं = त्यों, उस प्रकार । सिंगी साँसा = लंबी साँस लेने को ही सिंगी फूकना (बजाना) समझो । गटा = गटरमाला । रहे प्रेम.गटा = जिसमें उलझा हुआा मन है उसी प्रेम को गटरमाला समझो। छाल = मृगछाला। त = तंत, तत्व या मंत्र । पचौभूत हहीं - शरीर के पंचभूतों को ही रमी हुई मभूत या भस्म समझो। मुंवरि पाँच पर रेहु = पाँव पर जो धूललगे उसी को खड़ाऊँ समझ २६