पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४६३

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२८५ सुन्नहि माँभ इंद्र बरम्हडा । सुन्नहि में टीके नवखडा ।। सुन्न हि तें उपजे सव कोई। पुनि बिलाड़ सब सुन्नहि होई ॥ सुन्नहि सात सरग उपराहीं । सुन्नहि सात धरति तराहीं। सुन्नहि ठाट लाग सब एक।। जीवहि लाग पिंड सगरे का ॥ सुन्नम सुन्नम सव उतिराई । मुनहि हैं सब रहै साई दोहा सुन्नहि महूँ मन ए ख, जस जस काया महें उ । काठी माँभ नागि जसदूध माहें जस घीज ॥ सोरठा जावैन एकहि , जागे देखढ़ छोर सब । मुहमद मोति सदकाढह नथनि अरंभ के 1 ३०!। मा मन मथन करे तन वीरू। दृहै सोड जो ग्रामू अहोरू ॥ पाँच भत नात महि मारै। दरव गरव करसी के जारे । मन माटा सम एस के धोवै । तन डे ला तोहि मानें बिलोच । जपहु वृद्धि के दुड़ सन फेन्दु दही र आंस हिया अभेरह पब्ध कढ़ई कैंसन फेरहूं। ऑोहि जोति महें जोति अरह ॥ अंतट साठी फूटे। निरमल होइ मया सब माखन उल* मूल उठे लेइ जोती। समुद माँह जस मोती । जस । जस घिउ होइ जराइ , तस जिज निरमल होइ। महै महेरा दूरि करि, भोग करै सुख स इ ॥ सोरठr हिया कंवल फ्ल, जिउ नेहि मां जस बासना । जस तन तजि मन महें भूल, मुहमद तब पहिदानिए ॥ ३१ उमी के टीके : टिके हुए हैं । ठाट संसार

सारे का ढाँचा। सब एका

लगा । एक शून्य से लगा अथत् िउसी पर ठहरा जोवहिसगरे है । का = सब का । शरीर जीव पर टिका सुन्नम सुत्रम ही शून्य में हुमा है । = शून्य । सुन्नतेि काह भह मन रूख -उस शून्य के भीतर ही मन रूपी वृक्ष (सवत्मा) है। = लकड़ी । जान = सा खटाई दूध में थोड़ा दही या जिसे डालने से वह। खंडेला जमकर दही हो जाता है । (३१) करसो = उपले को राख । = ३वेह ==मथानी। दुइ सन फेरह एक ही में ध्यान जमाओो, द्विविधा छोड़ो। चर हो, फटे वाँ = पीछे से । कई=छोटा बेला या दोया जिसे मटके में डालकर दहौ निकालते हैं। जोति = ब्रह्मज्योति । ग्र रह = मिला ! अतरपट = का उस माया परदा जिससे हृदय वहज्योति का साक्षात्कार नह ! महेथे कर सकता । मया। = माया । उल* = उमड़कर ऊपर जाता है । । । महरा महींमद्रा । बासना बास, गध ।