पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४७५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


अब्रावट २९३ अगिनि, पानि अ माटी, पवन फूल कर मल । उन्हई सिरजन कीन्हा, मारि कीन्ह अस्थूल ॥ । देख गर, मन चीन्ह, कहाँ जई खोजत रह । जान परवीन, मुहमद तेहि सुधि पाइए 1 ५२ चेला चरचत गुरु गन गावा। खोजत छि परम गति पावा ॥ गुरु बिचारि चेला जेहि चीन्हा। उत्तर कहत भरम लेइ लीन्हा। जगमग देख उहै उजियारा। तनि लोक लहि किरिन पसारा है। मोहि ना वरन, न जाति अजाती। चंद न रुज, दिवस ना राती ॥ कथा न अहैआकथ भा रहई। बिना बिनार समझिम का प्रई ? ।। सहं राई बसि जो करई। । जो व: सो धीरज धरई ।। क हैके वरनि कहानी। जो घूमें सो सिद्धि गियानी ॥ प्रम माटी तन भड, माटी मद् नव खंड । । कर प्रचंड ज खेलें मटि क ; हैं, भाटी प्रेम । के सरा गलि सोड माटी हो, लिनेहारा । वापुरा । जो न मिटावै कोई, है लिखा ॥ बहर्ता दिना ॥ ५३ वश में करके अस्थल कहाँ जा बोजत या मारवश । = स्थथल से रहै - विना गुरु क कहीं इधर उधर भटकता रहा ।“जमि परै जो समभ पड़े । नेहि सुधि (५३ मार्ग पता जायमा पाइए = उनसे ईश्वर से मिलने के का मिल । ) चरचत - पहचानते ही । छि = जिज्ञासा करके । चेल के अधिकारी शिप्य। लiह । केह = जो कोइ । खैले माटि कहें = शरीर को लेकर प्रेम = तक जे का खेल खेल डाले । माटीमिट्टी में, शरीर में । 0 के