पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/५२

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( ३२ ) । अंक ४) पर नागमती की दशा पर एक पक्षी को दया श्राती है । वह उस ःख का कारण पूछता है । नागमती उस पक्षी से कहती है चारिउ चक्र उजार भएकोई न फंदेसा टेक । कहीं विरह दुख आपन, बैटिं सुनए ट्रेंड एक इसपर वह पक्षी संदा ले जाने को तैयार हो जाता है । पद्मावती से कहने के लिये नागमती ने जो संदेशा कहा है वह अत्यंत मर्मस्पर्शी है । उसमें मानगर्व आादि से रहितसुखभोग की लालसा से अलग, अत्यंत न श्र, शीतल औौर विशुद्ध प्रेम की झलक पाई जाती है पद्मावति सौ कहेतु, बिहंगम । कंत लोभाड़ रही करि स गम ॥ तोहि चैन सुख मिले सरीरा। मो कहें दिए ढूंद दुख पूरा ॥ कबढ़े बिनाही फेंग श्रोहि पीऊ। घापुहि पाई, जानु पर जोऊ ॥ मोहि भोग स काज न बारी। सौंह दिस्टि के चाहनहारी ॥ के मनुष्य के प्राश्रितमनुष्य के पाले हए, पेड़ पौधे किस प्रकार मनुष्य के सुख से सुखी और दु:ख से दु:खी दिखाई देते , यह दृश्य बड़े कौशल ऑौर बड़ सहृयदता से जायसी ने दिखाया नागमती की विरहदशा में उसके बाग बगीचों में उदासी बरस रही थी । पेड़ पौधे सब मुरझाए पड़े थे । । उनकी सुध कौन लेता है ? पर राजा रत्नसेन के चित्तौर लौटते ही पलुही नागमती के बारी। सोने फूल फूलि फुलवारी ॥ जावत पंखि रहे सब दहे । सबै पंखि बोले गहगढ़ जब पेड़ पौधे सूख रहे पक्षी भी झुलस रहे थे तब ग्राश्रय न पाकर ताप से थे । इस प्रकार नागमती की वियोगदशा का विस्तार केवल मनुष्य जाति तक ही नहीं पशु पक्षियों और पेड़ पौधों । कालिदास ने हुए तक दिखाई पड़ता थापाले मग और पौधों के प्रति शकुंतला का स्नेह दिखाकर इसी व्यापक और विशद भाव को व्यंजना की है। विप्रभ शृंगार ही पदमावतमें प्रधान है । विरहदशा के बर्णन में जहाँ कवि ने भारतीय पद्धति का अनुसरण किया है, वहाँ कोई वीभत्स दश्य नहीं है । कृशता, तापके उन्होंने गार अरुचिकारक आाया। , वेदना ग्रादि वर्णन में भी के पमुक्त वस्तु सामने रखी है, केवल उसके स्वरूप में कुछ अंतर दिखा दिया है । । जो पद्मिनी स्वभावतः पद्मिनी के समान विकसित रहा करती थी वह सूखकर मुर झाई हुई लगती है केंवल सूखपखुरी बेहरानी। गलि गलि के मिलि छार हेरानी ॥ इस रूप में प्रदात व्यक्ति के प्रति सहानुभूति और दया का पूरा अवसर रहता है। पाठक उसकी दशा व्यंजित करनेवाली वस्तु की ओोर कुछ देर दृष्टि गड़ाकर देख सकते हैं । मुरझाया फूल भी फूल ही है । अतीत सौंदर्य के स्मरण से भाव औौर उद्दीप्त होता है । पर उसके स्थान पर यदि चीरकर हृदय का खून, नसें और हड्डियाँ आादि दिखाई जायें तो होते हुए भी इन वस्तुओं ओर जमाते न दया की द प्टि बनेगा ।