पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/५३

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( ३३ ) विरहदशा के भीतर निरवलंबवता की अनुभूति रह रहकर विरही को होती है। देखिएकैसा परिचित और साधारण प्राकृतिक व्यापार सामने रखकर कवि ने इस निरवलंवता' का गोचर प्रत्यक्षीकरण किया है ग्रवा पवन बिछोह कर पात परा बेकरार । तरिवर तजा जो रि के लाने केहि के डार । 'लागे केहि के डारमुहावरा भी बहुत अच्छा आया है । पद्मावतमें यद्यपि हिंदू जीवन के परिचायक भावों की ही प्रधानता पर बीच बीच में फारसी साहित्य द्वारा पोषित भावों के भी छींटे कहीं कहीं मिलते हैं । विदेशीय प्रभाव के कारण वियोगदशा के वर्णन में कहीं कहीं वीभत्स चित्न सामने आ जाते हैं, जैसे कवादे सीख' वाला यह भाव विरह सरागन्हि भू माँ। गिरि गिरि परे रकत के आंसू ॥ कटि कटि माँसु सराभ पिरोवा। रकत के । ग्राँस मॉसु सब रोवा ॥ खिन एक बार माँसु मस ऐंजा। खिन्ह चबाई सिंघ मस पूजा ॥ वियोग में इस प्रकार के वीभत्स दृश्य का समावेश जायसी ने जो किया है वह तो किया ही है, संयोग के प्रसंग में भी वें एक स्थान पर ऐसा ही वीभत्स चित्न सामने लाए हैं। । बादल जब अपनी नवागत वधू की ओर से दृष्टि फेर लेता है, तब वह सोचती है कि क्या मेरे कटाक्ष तो उसके हृदय को बेधकर पीठ की ओर नहीं जा निकले हैं। यदि ऐसा है तो बी लगाकर मैं उसे खींच और जब वह पीड़ा से चौंककर मुझे पकड़े तो गहरे रस से उसे धो डाल मक्ष पिछ दिष्टि समानेउ साल। हलसा पीठि कढ़ाव साल ॥ कुच बी अब पीठि गड़ोव। गहै जो कि, गाढ़ रस धोव ॥ कटाक्ष या नेत्रों को ‘मनियारे, नुकीले' तक कह देना तो ठीक है, पर ऊहात्मक या वस्तुव्यंजनात्मक पद्धति पर इस कल्पना को और आगे बढ़ाकर शरीर पर सचमुच घाव आादि दिखाने लगना काव्य की सीमा के बाहर जाना है, जैसा कि एक कवि जी ने किया है- काजर दे नहएरी सुहागिनि : ऑाँगुरी तेरी कटेंगी कटाछन । यदि कटाक्ष से उंगली कटने का डर है तब तो तरकारी चीरने या फल काटने के लिये , हंसिया आदि को कोई जरूरत न होनी चाहिए। कटाक्ष मन में चुभते हैं न कि प्रत्यक्ष शरीर पर घाव करते हैं । बिरहजन्य कृशता के वर्णन में भी जायसी ने कविप्रथानुसार पूरी अत्युक्ति की है, पर उस प्रत्युक्ति में भी गंभीरता बनी हुई है, वह खलवाड़ या मजाक नहीं होने पाई है । बिहारी की नायिका इतनी क्षीण हो गई है कि जब साँस खींचती है तब उसके झोंके से चार कदम पीछे हट जाती है और जब साँस निकालती है तब उसके साथ चार कदम आगे बढ़ जाती है । घड़ी के पेंडुलम की सो दशा उसकी रहती है । इसी प्रकार उर्दू के एक शायर साहब ने नाशिक को लू ” या खटमल का बच्चा बना डाला में