पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/५५

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( ३५ ) बाट मसू अथाह गंभीरी । जिद बाउर भा फिरे भंभीरी ॥ जग जल बड़ जहाँ लगि ताकी । मोरि नाव खेवक बिन थाकी । जेठ जगे जंग चले ल्वारा । उठहि बवंडर परहि शृंगारा । उठे यागि नौ प्रावै ग्राँधी । नैन न सूझ, मरी दुख बाँधी ॥ अपनी भावुकता का बड़ा भारी परिचय जायसी ने इस बात में दिया है कि रानी नागमती विरहदशा में अपना रानीपन बिल्कुल भूल जाती है और अपने को केवल साधारण स्त्नी के रूप में देखती है । इसी सामान्य स्वाभाविक वृत्ति के बल पर उसके विरहवाक्य छोटे बड़े सबके हृदय को समान रूप में स्पर्श करते हैं । यदि कनकपर्यक, मखमली सेज, रत्नजटित अलंकार, संगमर्मर के महलखसखाने इत्यादि की बातें होतीं तो वे जनता के एक बड़े भाग के अनुभव से कुछ दूर की होतीं । जायसी ने स्त्री जाति की या कम से कम हिंदू गृहिणी मात्र की सामान्य स्थिति के भीतर विप्रभ ग्रंगार के अत्यंत समुज्वल रूप का विकास दिखाया है । देखिए चौमासे में स्वामी के न रहने से घर की जो दशा होती है वह किस प्रकार गृहिणी के विरह का उद्दीपन करती है पुष्य नक्षत सिर उपर आवा । हौं बिनु नाह, भंदिर को छावा ॥ इसी प्रकार शरीर का रूप देकर बरसात थाने पर साधारण गृहस्थों की चिता औौर आायोजना की झलक दिखाई गई है तप । लागि अब जेठ साढ़ी। मोहि पिउ बिनु छाजन भड़ गाढ़ी ॥ तन तिनउर झरों भा, खरी । भइ बरखा, दुख आागरि जरी ॥ बंध नाहि औौ कंध न कोई । बात न आावकहीं का रोई ॥ साँछि नाँर्टि, जग बात को पूछा। बिनु जिउ फिरे नुज तनु छूछा ॥ भई दुहेली टेक विनी। थाँभ नाहि, उठेि स न थेनी ॥ मेह वह नैनाहा। छपर छपर होइ रहि बिनु नाहा ॥ कोरी कह, टाट नव साजा । तुम बिनु कंत न छाजनि छाजा ॥ यह नाशिक माशूकों का fर्लज्ज प्रलाप नहीं है, यह हिंदू गृहिणी की विरह वाणी है। इसका सात्विक मर्यादापूर्ण माधुर्य परम मनोहर है । यद्यपि इस वारहमासे में प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों की रूढ़ि के अनुसार अलग अलग झलक भर दिखाई गई है, उनका सांप्लष्ट चित्रण नहीं है, पर एक प्राध जगह कवि का अपना निरीक्षण भी बहुत सूक्ष्म और सुंदर है जिसका उल्लेख वस्तुवर्णन के अंतर्गत किया जायगा। अब दु:ख के नाना रूपों और कारणों की उद्भावना लीजिए। जायसी के विरहोदगार अत्यंत मर्मस्पर्शी हैं । जायसी को हम विप्रभ श्रृंगार का प्रधान कवि कह सकते हैं । जो वेदना, जो कोमलताजो सरलता औौर जो गंभीरता इनके में है, वचनों वह अन्यत्न दुर्लभ है। नागमती सब जीव जंतुओंपशु पक्षियों में सहानुभूति की भावना करती हुई कहती है पिछ स कहेतु संदेसड़ा, हे भौंरा : हे काग । सो धनि बिरहै जरि मुईतेहि क धुवाँ हम्ह लाग ॥