पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/९६

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( ७ सोन नदी आस मोर पिउ गरुवा। पाहन होड़ परै जो हरवा ॥ जेहि ऊपर अस गरुवा पीऊ। सो कस डोलाए डोले जीज ॥ पिछली चौपाई में गरुग्रा’ और डोलैशब्दों के प्रयोग द्वारा कवि ने जो एक अगोचर मानसिक विषय का गोचर भौतिक व्यापार के रूप में प्रत्यक्षीकरण किया है। वह काव्यपद्धति का अत्यंत उत्कृष्ट उदाहरण है, पर उससे भी बढ़कर है व्यंजित गर्व की मामिकता। यह गर्व पातिव्रत की अचल ध री है । जिसमें वह गर्व नहीं, पतिव्रता नहीं । एक बार एक लुच्चे ने रास्ते में एक स्त्री को छेड़ा । वह स्त्री। छोटी जाति की थी पर उसके ये शब्द मुझे अबतक याद हैं कि ‘क्या तू मेरे पति से बहत संदर है ? ' 'समानऑौर कृतज्ञता' ऐसे भावों की व्यंजना भो जायसी ने बड़ो ही मार्मिक भाषा में कराई है । बादल जब राजा रत्नसेन को दिल्लो से छुड़ाकर लाता है तब पद्मिनी बादल की आारतो पूजा करके कहती है यह गजगवन गरव सों मोरा । तुम राखा बादल नौ गोरा । सेदुर तिलक जो ग्राँकुस ग्रहा। तुम राखा माथे तो रहा । काछ काछि तुम जिउ पर खेला। तुम जि यानि जूस मेला ॥ राखा छातचंवर औौधारा। राखा द्रघट झनकारा ॥ राजा रत्नसेन के बंदो होने पर नागमती जो विलाप करती है उसके वोच पद्मिनी के प्रति उसकी भु झलाहट कितनी स्वाभाविक है, देखिए पदमिनि ठगिनी भई कित साथा। जहि ते रतन परा पर हाथा ॥ शोक के दो प्रसंग पद्मावत' में ग्राए हैं-—पहला रत्नसेन के जोगो होने पर, दूसरा रत्नसेन के मारे जाने पर। इनमें से पात्र द्वारा व्यंज ा पहले ही प्रसंग में है, दूसरे में केवल करुण दृश्य का चित्रण है। रत्नसेन के जोगो होकर घर से निकलने पर रानियाँ जो विलाप करतो हैं उसमें पहले सुख के प्राधार के हटने का उल्लेख फिर उससे उत्पन्न विषाद की व्यंजना है । रोवह रानी तह पराना। नोंचहि बार करहि खरिहाना ॥ चूह गिऊ भरन उर हारा। अब कापर हम करव सिगारा ॥ जाक कहरह रहसि के पीऊ। सोइ चला, काकर यह जोऊ । मरे चहहि पै मरे न पावह। उठं नागि सब लोग बुझावह ॥ रसळों की दृष्टि में यहाँ करुण रस की पूरी व्यजना है क्योंकि विभाव के अतिरिक्त रोना औौर बाल नोचना अनुभाव औौरे विषाद संचारी भो है । जैसा पहले कहा जा च का है, राजा रत्नसेन के मरने पर कवि ने जिस करुण परिस्थिति का दिखाया है वह दृश्य अत्यंत प्रशांत और गंभीर है । । रानियों के मुख से क्षुब्ध ग्रावेग की व्यंजना नहीं कराई गई है, केवल पद्मिनी के उस समय के रूप की झलक दिखाकर को परिस्थिति गंभोरता का आभास दिया गया है पद्मावति पुनि पहिरि पटोरी। चली साथ पिय के होइ जोरी ॥ सूरज छिपा रैनि होझ गई । पूनिटें अमावस सस भई ।