पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/९५

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( ७५ ) समय रणक्षेत्र में जाने को तैयार होता है, उस समय माता की यह शंका बहुत ही स्वाभाविक है। बादल राय मोर तुड बारा । का जान सि कस होड़ जुझारा ॥ बादसाह पृहुमीपति राजा। सनमुख होइ न हमीरहि छाजा ॥ बरस हि सेल बान घन घोरा। धीरज धोर न बाँधिहि तोरा ॥ जहाँ दलपती दल मलहि ,तहाँ तोर का ाज ? नाजु गवन तोर थाने, बैटि मानु सु रु ख राज ।॥ शंका तक पहुचता हुआा यह ‘अनिश्चयप्रेमप्रसूत है, गूढ़ २ति भाव का द्योतक । वेयर लव इज ग्रेट, दि लिटिलेस्ट डाउट्स आार फियर्स । वेयर लिटिल फियर्स ग्रो ग्रेट, ग्रेट लव इज देनर । --शेक्सपियर मायके के स्वाभाविक प्रेम की कैसी गंभीर व्यंजना इन पंक्तियों में है। गहबर नैन जाए भरि माँसू । छाँव यह सिंघल कैलास ॥ खड़िकें नैहर, चलिकें बिछोई । एहि रे दिवस कहें हों तब रोई ॥ ड़िछे नापनि सखी सहेली। दूरि गबन तजि चलिखें अकेली ॥ नैहर माह काह सुख देखा। जन् होइगा सपने कर लेखा ॥ भिलहु सखी हम तहँवाँ जाहीं । जहाँ जाइ पुनि ग्राउब नाहीं ॥ हम तुम मिलि एकै सेंग खेला । अंत विछोह आानि गिउ मेला ॥ दूती और पद्मावती के संवाद में पद्मावती द्वारा पातिव्रत की बड़ी ही विशद व्यंजना हुई है । पातिव्रत कोई एक भाव नहीं है। वह धर्म औौर पूज्यवृद्धि मिश्रित दांपत्य प्रेम है । उसके अंतर्गत कभी रतिभाव की व्यंजना होती है, कभी प्रिय के महत्व को प्रकाशित करनेवाले पूज्य भाव की, कभी प्रिय के महत्व के गर्व की और कभी धर्मानुराग की । पहले पद्मावती उस दूती को अपने अनन्य प्रेम की सूचना इस प्रकार देती है अहा न राजा रतन गुंजोरा। केहि क सिंघासन केहि क पटोरा ॥ चहें दिसि यह घर भा अंधियारा । सब सिंगार लेइ साथ सिधारा ॥ काया बलि जानु तब जामी। सोचनहार भाव घर स्वामी ॥ इसपर जब दूती दूसरे पुरुष की बात कहती है तब वह क्रोध से तमतमा उठती है औौर धर्म के तेज से भरे ये वचन कहती है-- रंग ताकर हो जाओँ काँचा। प्रापन तजि जो पराएहि मुंचा ॥ दूसर करे जाइ दुइ बाटा। राजा दुइ न होंहि एक पाटा ॥ साथ ही अपने पति का महत्व दिखाती हुई उसपर इस प्रकार गवं प्रकट करती । कुल कर पुरुष सिंह जेहि केरा । तेहि थल कैस सियार बसेरा ? ॥ हिंया फार कू कुर तेहि केरा। सिंघहि तजि सियार मुख हेा ॥