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से अंशोंके समान है या नहीं। उदाहरणके लिये कह सकते हैं कि अत्यन्त तीव्र उष्णता बहुतसी कम कम उष्णता मिलानेसे नहीं होती। यह कहनाभी युक्ति संगत नहीं है कि किसी दो समान वस्तु को तीव्रता का भेद किसी दूसरी दो वस्तुओं की तीव्रताके भेदसे तुलना नहीं किया जा सकता। उदाहरणार्थ यह नहीं कहा जा सकता कि नीले और हरे रङ्गका भेद हरे और पीले रङ्गके भेदके समान ही है। इन उदाहरणों में समधर्मी अथवा सममूल मानाधार (Homogeneous units) अंश की अनन्त परम्पराका अस्तित्व मानने के लिये कोई भी आधार नहीं हैं। उसी भाँति यदि भिन्न भिन्न गुणधर्मों के उदाहरण लिये जायें तो इसमें तनिक भी सन्देह नहीं रह जाता कि वे संख्या मर्यादित हैं। आधि भौतिक शास्त्रोंके साम्प्रतिक विकास द्वारा इस कल्पनामें कोई तत्व ही नहीं रह जाता कि दृश्य पदार्थ अनन्त अंशोमे विभाज्य है। अनन्तगुण—भारतके तत्ववेत्ताओंने गुणधर्मके अनन्तत्व को कल्पना का उपयोग ईश्वर की कल्पनामें किया है। अनन्तत्व की ऐसी कल्पना प्रायः ज्ञान, शक्ति तथा दयालुता आदि गुणों के ही विषयमें की जाती है। इस कल्पनामें यदि अनन्तत्व का अर्थ असीम लिया जाय तो अनन्तज्ञानसे तात्पर्य होगा केवल वस्तुओं की अनन्त संख्याका ज्ञान। संख्याकी घटना एकही तत्व पर होनेसे कोई भी निपुण गणितज्ञ अनन्त संख्याकी कल्पना कर सकता है। ऐसा होने पर भी यह नहीं कहा जासकता कि संख्याक सम्पूर्ण पारस्परिक सम्बन्ध से वह भिज्ञ होगा। इससे थोड़ा बहुत अनन्त ज्ञानके विषयमें समझमें आ सकता है। किन्तु अनन्त का अर्थ अन्तरहित लगाने पर अनन्त-शक्ति की कल्पना करना अत्यन्त कठिन है। कुछ ग्रंथकारोंने इस अनन्त शक्तिपर बड़े बड़े अनुमान दौड़ाये किन्तु वे सब व्यर्थ ही सिद्ध हुए। जे॰ एम॰ ई॰ मॅकृगॅर्ट के मतानुसार अनन्त-शक्तिका अर्थ परस्पर-विरोधी घटनाओं को एकमें घटित करना है। काले रङ्गको सफेद, उत्तम को खराब, अनन्त को सान्त (अन्त-सहित), २+२ को ५ अथवा १००, इत्यादिके साथ समावेश करना। किन्तु अनन्त-शक्तिसे परिपूर्ण ईश्वरमें शक्ति का बिल्कुल अभाव भी सम्भव है। अतः अनन्त शक्ति में से लिये हुए कोई भी विशेष गुण को ही प्रकट करना सम्भव देख पड़ता है, क्योंकि ऐसे समय अशक्य अथवा अप्रिय पदार्थ अलग कर दिये जाते हैं। ऐसे ही लिये हुए विशेषगुणके अनन्त |
होनेके कारण अनन्तशक्ति का अर्थ अन्तरहित शक्ति भी किया जा सकता है। अनन्त कल्याण का अर्थभी अनन्त शक्तिके समान किया जाना सम्भव है। इसी आधारपर अनन्त कल्याण का सम्पूर्णहित गुण-वाचक अर्थ लगाना चाहिये। कदाचित् ईश्वरकी मर्यादित कल्पना उपरोक्त अनन्तकल्पनाकी बाधाओंके कारण दी हुई हो। अनन्त-विश्व—(Cosmos) यदि एक दृष्टि से देखा जाय तो विश्वमें भी अनन्तत्वका समावेश होता है, क्योंकि उनमें संख्या का समावेश होता है जो अनन्त हैं ही। किन्तु इससे यह नहीं कहा जासकता कि विश्वमें अस्तित्व (Existence) अनन्त है। यदि अस्तित्व का अर्थ इतना ही लिया कि जो कल्पना करने योग्य दृष्टिसे सत्य हो, तो यह कहना पड़ेगा कि विश्वमें अनन्तत्व ही अनन्तत्व भरा पड़ा है। किन्तु यह कहना कठिन है कि विश्व ही अनन्त है। केवल सर्वव्यापी और पूर्ण होने की दृष्टिसे ही वह अनन्त अवश्य कहा जासकता है। अनन्तदेव——(१)-यह भास्कराचार्य का वंशज था। ब्रह्मगुप्तके सिद्धान्तके २० वें अध्याय और बृहज्जातक पर इसने टीका की है। इसका शक संवत ११४४ हैं (शं॰ बा॰ दीक्षित-भारतीय ज्योतिश शास्त्र) (२)—यह कृष्णभक्ति चंद्रिका नामक नाटक का कर्ता था। इसके पिता का नाम आपदेव था। अनन्त देव राजा बाजबहादुरके आश्रयमें रहता था। उसका पिता आपदेव पूर्वकालीन अनन्तदेव का पुत्र और पूर्वकालीन आपदेव का नाती था। (ऑफ्रक्ट——कट, कॅट, पीटरसन रिपोर्ट ४) अनन्तपद——(Myriopoda)—इस जातिमें शतपद, गोजर, वाणी इत्यादि जन्तु होते हैं। यह संधीपाद जन्तुओं का ही एक वर्ग है । इनमें तथा कीटकवर्गमें बहुत साम्य होता है। वायुनलिका के संयोगसे ही इनकी श्वांस-क्रिया चलती रहती हैं। अपने चीरदार शृङ्ग, युगलनेत्र, दो अथवा तीन द्ष्ट्रोंसे यह शीघ्रही पहचाने जासकते हैं। इनके कबन्ध प्रदेशपर अनेक वलय होते हैं और प्रत्येक वलय के साथ दो पैर जुड़े रहते हैं। अन्य कवचधारी अथवा कोटकवर्गोंसे इनकी तुलना करने पर इनमें बहुत कमी देख पड़ती है। इस श्रेणीके जीवोंके दो मुख्य भाग किये गये हैं। पहला भाग शतपदों (Ceptipoda) और दूसरा युगलपदों (Diplopoda) का है। कुछ शास्त्रज्ञों |
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अनन्तत्व
अनन्तपद
ज्ञानकोश (अ) २१८