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इस नगरका उल्लेख ४११-१२ ई० में चीनी बौद्ध यात्री फाह्यातने अपने ग्रन्थमें किया है जिसमें उसने इसकी भड़कीली इमारतों भिजुओंकी विद्वत्ता और राजा तथा प्रजाके पवित्र आचरण का सुन्दर वर्णन किया है। उस समय अनुराध पुरमें मगधके नालन्द विद्यापीठकी तरह ही प्रसिद्ध एक विद्यापीठ था जिसमें वैद्यक, ज्योतिष, काव्य, व्याकरण और साहित्यको उच्च शिक्षा दी जाती थी। यहाँ प्रायः पाली भाषाके ही ग्रन्थ पढ़ाये जाते थे। इसमें नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र तथा धार्मिक तत्वज्ञानकी भी शिक्षा दी जाती थी। इस विद्यापीठमें सिलोनके ही नहीं प्रत्युत उत्तर भारत एवं दूर दूर स्थानोंके विद्यार्थी अध्ययनके लिये पाते थे। इन्हीं विद्यार्थियों में गया (विहार) का सुप्रसिद्ध भाष्यकार बुद्धघोष भी था। जिस समय बुद्धघोष सीलोनमें था उस समय जलके अभावको दूर करनेकेलिये धातुसेन नामक राजाने ४५०ई० में एक झील बनवायी जिसका घेरा पचास मील है। इसके एक ओर का वाँध चौदह मिल लंबा है उसी झीलसे नहरोंके द्वारा शहर में पानी खाया गया है। इन नहरोमें से कई अभी तक वर्तमान हैं और खेतीके काम में उनका उपयोग होता है । अनुराधपुरका अंतिम मुख्य काम यही बाँध था। इसके अनन्तर यहाँके राजपुरुषोमें परस्पर युद्ध हुये जिनमें वे तामिल लोगोंकी भी सहायता लिया करते थे। इन तामिल लुटेरोकी सेनाओं ने अनुराधपुरको कई बार लूटा। ७५० ई० यहाँ से राजधानी हटाकर पुलस्त्यपुर में ले जानी पड़ी। तब से ग्यारहवीं शताब्दीके मध्य तक इसका शासन-सूत्र कई बार कई पक्षीमें बद्- लता रहा। ग्यारहवीं शताब्दीमें एक बार सिंहली पाखण्डीने इसे अपने अधिकारमें किया था पर वह भी राजच्युतकर दिया गया, यहाँ तक कि १३०० ई० में अनुराधपुरकी बस्ती प्रायः उजाड़ हो गयी और वोधि वृक्ष के निकट यत्रतत्र कतिपय भिक्षुकोंके अतिरिक्त और कोई न दिखायी पड़ता था। उसके आसपास जंगल भी हो गया था। किन्तु आजकल पुनः वहाँ पर व्यवस्थित रूपसे नगर बसानेका अंग्रेजोंका विचार हो रहा हैं। १६०५ ई० में मटलेसे लेकर अनुराधपुर तक रेलवे लाइन भी बढ़ा दी गयी है। अनुविन्द(१) दुर्योधनके पक्षका एक वीर जिसे अजुनने मारा था। बसुदेवभगिनी राजाधि देवी और उसके पति अवन्तीके राजा जयसेनका
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कनिष्ठ पुत्र । ज्येष्ठ पुत्रका नाम विन्द था। (महा० दो० ५० १९) (२) विन्द और अनुविन्द नामके कैकयराजा के दो पुत्र थे। अनुविन्द महाभारतमें पाण्डवों की ओर था। उसे सात्यकीने मारा था। (महा. कर्ण पर्व० ३३) (३) धृतराष्ट्रके सौ पुत्रोमें से एक । ( महा० आदि प०५६) अनुशाल्व-यह सौभपति शाल्व राजाका भाई था। शाल्वको श्रीकृष्णने मारा था। इसीका बदला चुकानेके लिये पाण्डवोंके अश्वमेध यज्ञके समय यह सेनाके साथ गुप्त रूपसे हस्तिनापुर आया और अवसर पाकर यशका धोड़ा चुरा ले गया। भीमसेनने सेना सहित इसका पीछा किया। प्रद्युम्न और वृषकेतुने इसे पकड़नेकी प्रतिज्ञा की पर प्रद्युम्न हार गया किन्तु वृषकेतु |
उसे पकड़ लाया। मृत्यु के भयसे इसने अश्वको
लौटा दिया और मित्रता कर अश्वमेध यज्ञमेसे हा यता करनेका भी वचन दिया ( जै० अश्वमेध अ० । १२-१४) इसका महाभारतमें कहीं उल्लेख नहीं है। अनूपगढ़-बीकानेर राज्य (राजपूताना ) के सरतगढ़ नजामतका एक मुख्य ठिकाना है यह बीकानेरसे ८२ मील उत्तरकी और है। जन संख्या लगभग एक हजार है। यह उच्अ० २६ २२ और पू० रे० ७३१२ में स्थित है । सन् । १७६८ ई०में यहां एक किला बना था जिसका नाम बीकानेर के राजा अनूपसिंहके नाम पर रखा गया में अनूपगढ़ विभागमें कुल ७५ गांव हैं जिनकी जन|संख्या ८००० है। इनमें प्रति सैकड़े ५१ राठौर हैं इस विभागमें जलका अभाव है। खेती भी |
मामूली है किंतु चरागाह अच्छे अच्छे हैं। सज्जी
और लाना (एक प्रकारका वृक्ष ) इस भागमें बहुत पैदा होते हैं। इससे सोडा बनाया जाता है। अनूप देशइस प्रान्तकी राजधानी माहिष्मती । थी जहाँ सहस्रार्जुन राज्य करता था। महाभारत । के समय यहाँ नील नामक राजा राज्य करता था जो पाण्डवोके पक्षमें था। ( महा० भी० पर्व ९) अनूप शहर तहसील-संयुक्तप्रांत के बुलन्द शहर जिलेके पूर्व दिशामें स्थित एकतहसील । इसमें । अनूपशहर, श्रहार और डिवाई तीन परगने हैं । यह उ०१० २८°५ से २८°३७. और पू. रे० ७७२ से ७८",२८' में स्थित है। इसका क्षेत्रफल ४४४ वर्गमील है। जनसंख्या लगभग दो लाख अस्सी हजार है। |
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अनुराधपुर
अनूप शहर तहसील
ज्ञानकोश (श्र २३४