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पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/५१

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अग्निक्रीड़ा
अग्निपुराण
ज्ञानकोश (अ) ४१

पेशवा तथा अन्य उच्चाधिकारी उनपरसे उन्हें देखते थे। आधुनिक कालमें अन्य आविष्कारोंके साथ साथ इस कलामें भी बहुत कुछ सुधार हुआ है और नई नई चीजे बनने लगी हैं। पेशवाओंके शासनकालमें महाराष्ट्र देशमें इसका खूब प्रचार था। सवाई माधवरावके विवाहके उपलक्षमें आतिशबाज़ीका जो वर्णन मिलता है उसका उल्लेख नीचे देते हैं।

आकाश मण्डल के तारागण—यह आतिश–बाज़ी आकाशमें जाकर फट जाती थी और इसमें से रङ्ग बिरङ्गे तारे दिखाई देते थे।

नारियल के पेड़—इसमें आग लगाते ही तोपके समान आवाज होती थी और रङ्ग बिरङ्गके शाखाकार तथा सर्पाकार दृश्य देख पड़ते थे।

प्रभा–चमक—इसमें सुनहले तथा रुपहले घूमते हुए चित्र दिखाई देते थे।

इसके अतिरिक्त और भी नाना प्रकार के बाण फूल इत्यादि होते थे।

आजकल इस देशमें हवाई जहाज़, चन्द्रजोत, छछुन्दर, साँप, बाण, रङ्गविरङ्गे तारे, फुलझड़ी, महताबी, सिंघाड़ा, चरखी, अनार तथा लक्डा इत्यादि देखनेमें आती हैं।

योरपमें भी आजकल इस सम्बन्धमे बहुतसे नये नये आविष्कार हुए हैं और वे भारतमें भी अब आने लगे है। इसलिये इस देशका आतिशबाजी का व्यवसाय बहुत धीमा पड़ गया है। यदि विद्वान तथा रसायनशास्त्र–वेत्ता इस ओर कुछ ध्यान दें तो इसका फिरसे पुनरुद्धार हो सकता है।

अग्निपुराण—इस पुराणके नामसे ऐसा भास होता है कि इसमें अग्निका विशेष वर्णन किया होगा, किन्तु यथार्थ में ऐसा नहीं है। अग्निद्वारा जो विद्यासार वसिष्ठ को प्राप्त हुआ था उसी का इसमें मुख्यतः उल्लेख है। पुराणों में सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचारिता—इन्ही पाँचों लक्षणों का बहुधा समावेश होता है। इसके अतिरिक्त और भी अनेक विषय होते हैं। किन्तु अग्निपुराणमें इन सबका विशेष महत्व नहीं देख पड़ता। 'परा' तथा 'अपरा' इन्हीं दोनो विद्याओं पर अधिक विवेचना की गई है। मानव समाजके हितके भी अनेक विषय इसमें भलीभाँति दिये हुए हैं। साधारण रीतिसे भी इसका निरीक्षण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन कालका यह एक विविध-विषयक स्वतन्त्र ज्ञानकोश है। अवतार-चरित्र, रामायण आदि इतिहास, जगत्का उत्पत्तिविवेचन, ज्योति–

शाला, वास्तुशास्त्र, वैद्यकशास्त्र, छन्दशास्त्र, नाट्यशास्त्र, काव्य, व्याकरण, तत्वज्ञान, नीतिशास्त्र आदि अनेक विषय इसमें दिये हुए हैं। पुराणों में यह तामस श्रेणीका ग्रंथ समझा जाता है, क्योंकि सांसारिक विषयों को छोड़कर परमार्थ सम्बन्धी बातें इसमें बहुत कम अंशोंमें हैं। इसमें किसी खास धर्ममार्गका समर्थन नहीं किया गया है, किन्तु ग्रन्थ देखनेसे यही विदित होता है कि ग्रन्थनिर्माण–समयमें शैवधर्म ही का जोर रहा होगा और मन्त्रतन्त्रपर लोगों की विशेष श्रद्धा रही होगी।

आनन्दाश्रम ग्रंथावली द्वारा प्रकाशित अग्निपुराणमें ३८३ अध्याय और ११४५७ श्लोक हैं। नारद पुराणमें १५००० और मत्स्य पुराणमें १६००० श्लोक अग्नि पुराणमें बताये गये हैं। नारद पुराण में और इस पुराणकी जो विषयानुक्रमणिका लिखी है, उसका भी पता अबके अग्नि पुराणमें नहीं लगता। बल्लालसेनने भी जिन अवतरणोंका अग्नि पुराणमें उल्लेख किया है वे सबभी वर्तमान अग्नि पुराणमें नहीं मिलते। इन सब बातोंसे यह स्पष्ट होता है कि अग्निपुराणका कुछ भाग लुप्त हो गया है। इसका रचना–काल भी निश्चित करना कठिन है किन्तु ऐसा अनुमान कर सकते हैं कि ई॰ ५ वीं शताब्दिके पश्चात् और यवनोंके आक्रमाणके पूर्व इस ग्रंथका संकलन हुआ होगा।

आधार ग्रंथ—दत्तका अग्निपुराण (वेल्थ आफ इण्डिया सीरीज़); काले का पुराण निरिक्षण। विन्टरनीज़की हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिटरेचर (German book) ! असन की हिन्दू क्लासिकलडिक्शनरी। अग्नि पुराण—आनन्दाश्रम आवृत्ति।

इस पुराणमें अनेक विषयोंके समावेश होने तथा अन्य पुराणोके विस्तारपूर्वक वर्णन होनेसे प्राचीन हिन्दुओ की सामाजिक और राजकीय व्यवस्थाका अच्छा ज्ञान हो सकता है। इसलिये इस ग्रंथका विस्तृत वर्णन दिया जाता है। और उन विषयों का, जिनके प्रति पाठकों की जिज्ञासा अधिक होना सम्भव है, का अधिक विस्तारसे वर्णन किया गया है। अग्नि पुराणमें अनेक शास्त्रों का विवेचन है। भिन्न भिन्न शास्त्रों के लेखोंके समय अग्नि पुराणका उल्लेख करना पड़ता है, अथवा उसके शास्त्र विवेचनका स्वरूप देना आवश्यक है। इसलिये अग्निपुराणका यथार्थ स्वरूप यहीं देना युक्ति–संगत होगा।