पृष्ठ:तिलस्माती मुँदरी.djvu/५९

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तिलिस्माती मुँदरी


न चाहिये-एक हाथ से मेरी और दूसरे हाथ से मेरी बीबी की टांगें पकड़ ले, फिर फुरती से उस घने पत्तों वाली झाड़ी पर जो मीनार की जड़ के नज़दीक दिखाई देती है कूद पड़, हमारे डैनों के सबब से तू ज़ोर से गिरने न पावेगी" राजा की लड़की ने फ़ौरन वैसा ही किया-उल्लू और उल्लन की टांगों को ज़ोर से थाम कर छज्जे से झट कूद पड़ी और परों की बड़ी फटफटाहट के साथ झाड़ी की मुलायम शाखो पर बगैर ज़रा भी चोट लगे जा पड़ी, वहां पर उसने उनकी टांगे छोड़ दी और झाड़ी की टहनियों और शाखो को पकड़ती हुई नीचे ज़मीन पर उतर गई, और वहां चारों तरफ़ देखने लगी कि किस तरफ़ को जाना बिहतर होगा कि दुश्मन उसका पीछा न कर सकें। उसी वक्त उसे वह सिपाही जो उसे पकड़ने को खंडहर की तरफ़ आ रहे थे दिखाई दिये। लेकिन उसकी खुशनसीबी थी कि वह उसे देख न पाये; और जिधर से वह आ रहे थे उसकी दूसरी तरफ़ वह फ़ौरन निकल गई और उनकी नज़रों से बचती हुई बड़े ज़ोर से एक छोटी सी गली की मोड की तरफ जो उसे वहां से दिखाई दे रही थी बेतहाशा दौड़ी। उस गली के दोनों तरफ़ बाग़ो की चहारदीवारियां थीं; उस तंग गली में वह थोड़ी ही दूर आई थी कि बांई तरफ़ की दीवार में एक दरवाजे के पास जब पहुंची दरवाज़ा किसी ने आहिस्ता और होशियारी से खोला। उस वक्त वह एक अंजीर के पेड़ की आड़ में छिप गई, जो कि दीवार में उगा हुआ था। उसने देखा कि एक लौंडी उस दरवाजे से निकल कर और चारों तरफ़ ऊपर नीचे देख कर फुरती से गली के सिरे की तरफ़ चली गई-जैसे ही वह नज़र से ग़ायब हुई राजा की लड़की पेड़ की आड़ से बाहर निकल आई और दरवाज़े के पास पहुंच कर उसने देखा