पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/५१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
[४८]


बिमलाके साथ चली। थोड़ी दूर चल कर बोली कि तुम सब चलो मैं पीछे से आती हूं और आप घर चली गई। बिमला और गजपति साथ चले, दुर्ग से बाहर कुछ दूर जाकर दिग्गज ने कहा कि आसमानी नहीं आई?

विमला नें उत्तर दिया न आई होगी-क्या करना है।

रसिकदास चुप रहे, फिर कुछ काल में ठंढी सांस लेकर बोले बर्तन रह गया।

----०----



तेरहवां परिच्छेद।
दिगज का साहस।

चलते २ मान्दारणगढ़ धाम पार होगया रात अंधेरी बड़ी थी केवल नक्षत्रों के प्रकाश से कुछ कुछ मार्ग सूझता था मैदान में पहुंचकर विमला के मन में शंका हुई किन्तु दोनों सन्नाटे में चले जाते थे। बिमला ने गजपति को पुकार के कहा?

रसिकदास० | क्या सोचते हो?

रसिकदास ने कहा कि मैं बर्तनों का ध्यान कर रहा हूं। बिमला सुनकर मुंह पर कपड़ा देके हंसने लगी और फिर बोली कि क्यों दिग्गज तुम भूत से डरते हो कि नहीं? दिग्गज ने कहा राम राम कहो, राम राम, और सरक कर बिमला के समीप चले आये।

बिमला ने कहा, यहां तो भूत बहुत हैं। इतना सुनकर दिग्गज ने झपट कर बिमला का वस्त्र पकड़ लिया।