मात है अापु जनी जगमात कियो पति तात सुतासुत जायो,
ता उर माँह रमा कै रमी बिधि बाम नरायन राम रमायो ;
लोक तिहूँ जुग चारिहूँ मैं जस देखौ बिचारि हमारोई गायो
जो हम सीस बसेरजनीसके नौ वहि ईसलै सीस बसायो। ॥३३॥
पीरपराई सों पीरोभयो मुख, दीननि के दुख देखे बिलातो, भीजिरही करुना करुना रस काल कि केलिनु सों कुम्हिलाती; लै-लै उसासन आँसुन सों उमगै सरिता भरिकै ढरि जातीपा , नाव लौं नैन भ% उछ% जल+ ऊपर ही पुतरी उतरातीx॥३४॥
- माया ने माता होकर और जगज्जननी से अवतार लेकर,
अपने पिता ईश्वर से विवाह करके पुत्र और पुत्रियाँ उत्पन्न की, और उस ईश्वर के उर में रमा होकर रमी, और उल्टी गति लेकर नारायण और राम को रमाया।
+ जब कलंक चंद्रमा के सीस पर बसा, तब उस चंद्र को महादेव ने माथे पर चढ़ाया।
- इतना संकोच करती है, मानो लुप्त ही हो जाती है।
$ करुणादेवी करुणा (दया) के रस से भीगी हुई है । पानदी भरकर बह जाती है ।
+ जब पानी भर जाता है, तब नीचे दब जाते हैं, और जब पानी उनसे निकल जाता है तब ऊपर उछल आते हैं।
x जल के ऊपर मानो आँख को पुतली उतराती है, अर्थात् केवल जल और पुतलो दिखलाई देती है, अथच शेष आँख दिखलाई देती ही नहीं। .
इस छंद में करुणा का बड़ा अच्छा वर्णन है।