पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१४३

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प्रतिभा-परीक्षा

हमारी राय में अधिक सम्मतियाँ स्वभावोक्ति और उपमा के पद होंगी, यद्यपि अनेक प्राचार्य अतिशयोक्ति के भी बड़े प्रशंसक हैं। संजीवन-भाष्यकार ने उर्दू भाषा के प्रसिद्ध कवि, हाली साहब की जो सम्मति उर्दू-शेर और विहारी के दोहे के संबंध में उद्धत की है, उससे साफ़ झलकता है कि हाली साहब अतिशयोति के अंध-भक्त नहीं हैं । श्राप लिखते हैं- ___“पस जब कि दोहे के मज़मून में 'मानों' यानी 'गोया' का लफ्ज़ मौजूद है, तो उसमें कोई 'इस्तहाला' यानी अदम इमकान बाकी नहीं रहता ; बरखिलाफ इसके शेर का मज़मून बिलकुल दायरे-इमकान से खारिज और ना-मुमकिन उल्-वन है । मोत- रिज़ जिस दलील से मज़मून शेर के मुताल्लिक हद दरजे की नज़ा- कत साबित करता है, उससे नज़ाकत का सबूत नहीं, बल्कि उसकी नकी होती है (पृष्ठ ३३२)।" हाली साहब की इस सम्मति को लक्ष्य में रखकर भाष्यकारजी पृष्ठ ३३४ पर लिखते हैं-"आशा है, हाली महोदय की इस विद्वत्ता पूर्ण बहस को पढकर 'राम' महाशय की शंकाओं का समाधान हो जायगा।" उपर्युक्त वाक्य का क्या अर्थ लगाया जाय ? यह कि हाला साहब की राय ठीक है और भाष्यकार को भी मान- नीय है या यह कि वे उस राय के पाबंद नहीं हैं ? जो हो, यदि हाली साहब की राय के अनुसार- मानहु तन-बबि अच्छ को स्वच्छ राखिबे काज , दृग-पग-पोछन को किए भूषण पायंदाज । वाला दोहा क्या नजाकत है कि बारिज उनके नीले पड़ गए ! हमने तो बोसा लिया था ख्वाब में तस्वीर का । शेर से श्रेष्ठ है और वास्तव में शेर में दिया हुआ वर्णन हाली