पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१४४

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देव और विहारी ... के कथनानुसार नज़ाकत की 'नफ़ी' करता है, तो विहारी- साल के एक-दो नहीं बरन् कम-से-कम पचास-साठ दोहे तो जरूर ही ऐसे निकलेंगे, जिनमें 'ननी' का दोष आरोपित हो जायगा। अँगरेज़ी-साहित्य के धुरंधर समालोचक, रस्किन महोदय की राय में* रसावेग-वश अयथार्थ वर्णन करनेवाले की अपेक्षा 'रस के वशीभूत होकर भी यथार्थ कह जानेवाला कवि श्रेष्ठ है। थोड़े शब्दों में इसका अर्थ यह है कि स्वभावोक्ति अतिशयोक्ति से श्रेष्ठ है । यह कहने की आवश्यकता नहीं कि स्वभावोक्ति और उपमा के चित्रण में देवजी का पद बहुत ऊँचा है। विहारी और देवजी की कविता के गुण स्थल विशेष पर पढिए । यहाँ पर उभय कविवरों का एक-एक छंद उद्धृत किया जाता है तथा दोनों छंदों का गुणोत्कर्ष व्यास रूप से दिखलाने का उद्योग किया जाता है । आशा है, प्रेमी पाठकों को इस प्रकार का निदर्शन रुचिकर होगा तथा उभय कविवरों के काव्योत्कर्ष की तुलना करने में भी सरलता होगी- MEANINRNT

  • 00, then, we have the three ranks : the man who perceives

rightly, because he does not teel, and to whom the primros* 18 very accurately the primrose, because he does not love.at. Then second. ly, the man who perceives wrongly, because he feels and towhom the primrose is anything else than a primrose: a Srar, or as any or a fairy's shield or a forsaken maiden. And then lastly, there is the man who perceives rightly inspite of his feelings and to whom the primrose is for ever uothing else than itselt-a httle flower appre- hended in the very plain and leaty fact of it, whatever and bow, manysoever the tassuerations and passions may be that crowd around it And in general these three classes may be rnted in Comparative order aa the men who are not the poets at all and the poets of the scoond order and the poets of the first (Raskin-Of thepathetic tallacy.)