पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१५८

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देव और बिहारी

कौशल देखिए । आँखों ने व्रत किया था । व्रत के भोर पारण के लिये कुछ चाहिए था । प्रियतम का रूप पारण-स्वरूप मिल गया । आँखों का प्रिय-वियोग-जन्य दुख जाता रहा । कितना पवित्र, सुकुमार और सूक्ष्म विचार है ! प्रेम का कैसा अनोखा चमत्कार है ! रूपक का कैसा सुंदर सत्कार है ! लौकिक व्यवहार का कैसा अलौकिक उदार प्रसार है ! हित की हितूरी क्यो न तूरी समुझावै पानि , सुख-दुख मुख सुखदानि को निहारनो; लपने कहाँ लो बालपने की बिमल बातें ? अपने जनहिं सपनेहूँ न बिसारनो। "देवजू" दरस बिनु तरस मरयो हो, पग परांस जियैगो मन-बैरी अनमारनो ; पतिव्रत-वती ये उपासी, प्यासी अखियन प्रात उठि प्रीतम पियायो रूप-पारनो । संयोगमय प्रेम का एक उदाहरण लोजिए। कैसा प्रानंदमय जीवन है ! रीझि-राझि, रहास-रहसि, हँसि-हँसि उठ ; सांसै भरि, आँसू भरि कहत दई-दई; चौकि-चौंकि, चकि-चकि, औचक उचकि "देव," छकि-छकि, बार्क-बकि परत बई-बई । दोउन को रूप-गुन दोऊ बरनत फिरें , घर न थिरात, रीति नेह की नई-नई ; मोहि-मोहि मोहन को मन भयो राधामय , राधा मन भोहि-मोहि मोहन-मई-मई । २-विहारी आइए, विहारी के प्रेम की भी कुछ बानगी लेते चलिए । इनका अठ ही निराला है-