पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१८७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


देव-विहारी तथा दास (७) भगवान् की अपार शोभा निरखने के लिये दो नेत्र पर्याप्त नहीं हैं, इसी बात की दोनों कवियों को शिकायत है। विहारीलाल को युगलकिशोर रूप देखने के लिये अनेक युगल-हग चाहिए । दासजी से दो नेत्रों से शोभा-सिंधु की शोभा देखते नहीं बनती। (८) प्रियतमा ने सुना है कि प्रियतम आज कल सपत्नी के वश में हो गए हैं। यह समाचार पाकर उसका आनंद द्विगुणित हो गया है । यह समाचार सुनकर उसने अपनी सखी की ओर बड़ी ही भेद-भरी निगाह डाली । इसमें गर्व, लज्जा और हँसी भरी हुई थी। विहारी का दोहा इसी दशा का पता देता है। दासजी के दोहे में पति विदेश से लौटकर आया है। पहलेपहल सपत्नी के सदन को गया। प्रियतमा ने इसे देख लिया । इस रश्य से वह हर्ष, गर्व, अमर्ष, अनख, रस और कोप में डूब रही है। प्रियतम की सपत्नी के प्रति प्रीति देखकर प्रियतमा की क्या दशा हुई है, इसी का दोनों ही दोहों मे चित्र खींचा गया है। दोनों उक्लियों की रमणीयता इसी बात में हैं। (१) श्रीकृष्णचंद्र के नेत्र बड़े ही ज़बरदस्त हैं। उन्होंने अंधेर मचा रक्खा है । सावधान रहते हुए भी ये ग़ज़ब ढहाते हैं। ये सोतों के यहाँ नहीं, बल्कि जागतों के यहाँ चोरी करते हैं । इनसे और वित्त की कौन कहे, चित्त-वित्त तक नहीं बचता। ये सभी कुछ जबरदस्ती हर लेते हैं । विहारीलाल के बरजोर दृगों की यही दशा है। दासजी अपने लाल के दृगों का कुछ हाल कह ही नहीं पाते। यद्यपि वे सावधान रहते हैं, फिर भी नेत्र उनके चित्त-वित्त की चोरी कर ही लेते हैं। दोनों ही कवियों ने नेत्रों के ऊधमी स्वभाव का वर्णन किया है । इस औद्धत्य में ही दोनों उक्तियों की रमणी- यता है।