पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१८८

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देव और विहारी (१०) विहारीलाल ने अपने चार दोहों में विरहाधिक्य का वर्णन किया है। विरहिणी की परोसिन को जाड़े की रातों में तो इतना कष्ट नहीं हुआ, पर अब गर्मी में उसके विरह-ताप के सन्निकट रहने में घोर कष्ट है । इस विरह-ताप का अंदाज़ा इसी बात से किया जा सकता है कि जाड़े की रातों में भी विरहिणी की सखियाँ विरह-ताप से बचने के लिये भीगे वस्त्रों की सहायता लेकर ही उस तक जा पाती थीं । एक दिन विरहिणी को इस प्रकार घोर विरह-ताप में बिललाते देखकर किसी ने उस पर गुलाबजल की शीशी उँडेल दी, जिसमें इसको कुछ शीतलता मिले, पर गुलाबजल बीच ही में सूख गया; विरहिणी के शरीर पर उसकी एक छीट भी नहीं पहुँची। विरहिणी जिस रावटी में रहती है, उसकी ठंडक का अनुमान इसी से किया जा सकता है कि वहाँ ग्रीष्म ऋतु की ठीक मध्याह्न की उष्णता के समय इतनी शीतलता पाई जाती है, मानो माघ मास की रात्रि का जाड़ा हो। इतनी शीतलता रहते हुए भी उस 'उसीर की रावटी' में बेचारी विरहिणी विरहाग्नि में 'औटी-सी जाती है। विहारीलाल ने नायिका के विरहाधिक्य का वर्णन इसी प्रकार किया है। इन्हीं अतिशयोक्किमयी उक्लियों में रमणीयता पाई जाती है। दासजी की निगाह भी एक विरहिणी पर पड़ी है । जिस स्थान में विरहिणी रहती है, वहाँ के आसपास के पुर-नगरवासियों की यह दशा हो रही है कि उन्हें माघ-मास में भी यही जान पड़ता है कि अभी ग्रीष्म ऋतु ही मौजूद है। विरहिणी तक पहुँचने के लिये शीतलोपचार करके, शरीर को जला रखते हुए, कठिनता से यदि कोई वहाँ तक पहुँचता भी है, तो उसे वहाँ से भागना पड़ता है। निकट से विरह-ताप सह सकने की सामर्थ्य किसी में भी नहीं रह गई है। लोग देखते हैं कि नायिका अपने शरीर पर गुलाब- जल उँडेलने का उद्योग करती है, पर वह बीच ही में सूख जाता