पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/२४९

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परिशिष्ट १-देवजी के एक छंद की परीक्षा सखी के सकोच, गुरु सोच मृग-लोचनि रि- ___सानी पिय सों, जु उन नेकु हँसि छुयो गातः "देव" वै सुमाय मुसुकाय उठि गए, यहिं सिसिकि-सिसिकि निसि खोई रोय पायो प्रात । को जानै री बीर बिनु बिरही बिरह-बिथा ? हाय-हाय करि पछिताय न कछू सोहात; बड़े-बड़े नैनन सों आँसू भरि भरि ढरि , गोरो-गोरो मुख आजु ओरो-सो बिलानो जात । यह रूपघनाक्षरी छंद है, जिसमें ३२ वर्ण होते हैं और प्रथम यति सोलहवें वर्ण पर रहती है। "एक चरन, को बरन जहँ दुतिय चरन में लीन, सो जति-भंग कबित्त है। करै न सुकवि प्रवीन ।" यहाँ 'रिसानी' शब्द का 'रि' अक्षर प्रथम चरन में है और 'सानी' दूसरे में । इस हेतु छंद में यति-भंग-दूषण है। चतुर्थ पद में आँसू भर-भरकर तथा ढरकर के पीछे वाक्य-कर्ता द्वारा कोई अन्य कर्म माँगता है, परंतु कवि ने कर्ता-संबंधी कोई क्रिया न लिखकर "गोरो-गोरो मुख प्राजु ओरो-सो बिलानो जात". मात्र लिखा है, जिससे छंद में दुःप्रबंध-दूषण लगता है। 'को जानै री बीर' में कई गुरु वर्ण साथ एक स्थान पर आ गए हैं, जिनसे जिह्वा को क्रेश होने से प्रबंध-योजना अच्छी नहीं है। यहाँ अंतरंगा सखी का वचन बहिरंगा सखी से है। जिस बहि-