पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/३६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
३४
भूमिका

यह शब्द मतिराम को बहुत खटका । उन्होंने इसी के कारण दोहे में पूर्ण निर्वाह हो सकनेवाले रूपक को भंग होते देखा । अतएव 'लौं' के निर्वासन पर उन्होंने कमर कसी । इस प्रयत्न में वे सफल भी हुए । उनका दोहा अविकलांग रूपक से अलंकृत है । मतिराम की इस मार्मिकता का रहस्य इस मुकाबले से ही खुलता है-इस तुलना से विहारी के दोहे की सुकुमारता और व्याकुलता और साथ ही मतिराम के दोहे में अलंकार-निर्वाह का दर्शन हो जाता है। कविता की जो परीक्षा इस प्रकार एक या अनेक कवियों की उक्लियों की तुलना करके की जाती है, उसी को 'तुलनात्मक समालोचना' कहते हैं। प्रायः समालोचना-रहित कुछ पद्य, जिनमें तुलना का अच्छा अवसर है, नीचे उद्धृत किए जाते हैं । इससे, आशा है, पाठकों को 'तुलनात्मक समालोचना' का अर्थ हृदयंगम करने में आसानी होगी- [क] विरह-जन्य कृशता का अतिशयोक्ति-पूर्ण वर्णन हिंदी के कवियों ने बहुत विलक्षण ढंग से किया है । दो-चार उदाहरण लीजिए- (.) हनुमानजी ने अशोक-वाटिका-स्थित सीताजी को श्री- रामचंद्र की मुद्रिका दी । उसे पाकर सीताजी तन्मय हो गई। वे मुद्रिका को जीवित प्राणी-सा मानकर उससे श्रीराम-लक्ष्मण का कुशल-संवाद पूछने लगी ; पर जड़ मुद्रिका से उत्तर कैसे मिलता ? अंत में कातर होकर सीताजी ने मुद्रिका के मौनावलंब का कारण हनुमानजी से पूछा । उन्होंने जो चमत्कार-पूर्ण उत्तर दिया, वह इस प्रकार है- तुम पूँछत कहि मुद्रिकै, मौन होत यहि नाम ; कंकन की पदवी दई, तुम बिन या कहें राम | केशव