पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/३७

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४० देव और बिहारी

हे सीताजी, तुम इसे मुद्रिका नाम से संबोधन करके इससे उत्तर माँगती हो, परंतु अब तो इसका यह नाम रहा ही नहीं। तुम्हारे विरह से रामचंद्र ऐसे कृश-शरीर हो गए हैं कि इस वास्त- विक मुद्रिका का व्यवहार कंकण के स्थान पर करते हैं। सो संप्रति इसको कंकण की पदवी मिल गई है। पर तुमने तो इसे वही पुराने 'मुद्रिका' नाम से संबोधित किया। ऐसी दशा में यह उत्तर कैसे दे ? पति के निस्सीम प्रेम एवं घोर शारीरिक कृशता का निदर्शन कवि ने बड़े ही कौशल से किया है। (२) मृत्यु विरह-विह्वला नायिका को ढूंढ़ने निकली । वह चाहती है कि नायिका को अपने साथ ले जाय । परंतु विरह-वश नायिका ऐसी कृश-शरीरा हो रही है कि देखने ही में नहीं आती। पर इससे निराश होकर भी मृत्यु अपने अन्वेषण-मार्ग से विरत नहीं होती । अत्यंत छोटी वस्तु ढूँढ़ने के लिये विकृत नेत्रों को ऐनक से बड़ी सहायता मिलती है । सो मृत्यु चश्मे का व्यवहार करती है। परंतु तो भी उसे नितांत कृशांगी नायिका के दर्शन नहीं होते। कृशता की पराकाष्ठा है- करी विरह ऐसी, तऊ गैल न छाँति नीच ; दीने हूँ चसमा चखन चहि, लहै न मीच । विहारी (३) यद्यपि कृशता-वश नेत्र द्वारा नायिका दृष्टि-जगत् के बाहर हो रही है, तो भी शय्या के चारों ओर दूर-दूर तक आँख फैली हुई है। यह नायिका के विरह-ताप-वश अंगों की गर्मी है। इससे उसके जीवित रहने का प्रमाण मिलता है- • दोखे परै नहिं दुबरी ; सुनिए स्याम सुजान ! जानि परै परजंक मै अंग-आँच-अनुमान । मतिराम