पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/४४

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भूमिका

परसत रेनु ताके सीस गंग-धार कढ़ी , "लेखराज" ऐसी बही पुरी जलाहल मैं; बिकल है जम भागे, अमदूत आगे भागे , पीछे चित्रगुप्त मागे कागद बगल मैं । श्रीयुत रामदास गौड़ की राय में लेखराज का छंद पद्माकर के छंद से कहीं अच्छा बना है । ( देखो सम्मेलन-पत्रिका, भाग १, अंक २-३, पृष्ठ ४५) [च] नायिका के विविध अंगों की धुति से आभूषण, हार श्रादि के रंगों में नाना प्रकार के परिवर्तन उपस्थित हुआ करते हैं । हिंदी के कवियों ने इनका भी बड़े मार्के का वर्णन किया है उदाहरणार्थ कुछ संकलित छंद नीचे लिखे जाते हैं- (१) अधर धरत हरि के परत ओंठ-दीठि-पट-जोति ; हरित बाँस की बाँसुरी इंद्रधनुष-दुति होति । विहारी (२) तरुनि अरुन ऍड़ान के किरिन-समूह उदोत ; बेनी-मडन-मुकुत के पुंज गुंज-रुचि होत । ___ मतिराम (३) संत कमल, कर लेत ही, अरुन कमल-छवि देत ; नील कमल निरखत भयो, हॅसत सेत को सेत । बैरीसाल ( ४ ) कर छुए गुलाब दिखाता है, जो चौसर गूंथा बेली का; गल-बीच चपई रंग हुआ, मुसकान कुंद रद केली का।