पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/७०

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७४ देव और विहारी 'राजभाषा अंगरेज़ी के प्रसिद्ध कविता-समालोचकों की सम्मति भी यही है। तत्काल आनंद( immediate pleasure )मय कर देना कविता का कर्तव्य है। यह आनंद-प्रदान रस के परिपाक से सिद्ध होता है । यों तो 'नीरस कविता भी मानी गई है और चित्र-काव्य का भी कविता के अंतर्गत वर्णन किया गया है, पर वास्तव में रसात्मक काव्य ही काव्य है। रस मनोविकारों के संपूर्ण विकास का रूप है। किसी कारण विशेष से एक मनोविकार उत्थित होता है, फिर परिपुष्ट होकर वह सफल होता है। इसी को रस-परिपाक कहते हैं। मनोविकार के कारण को विभाव, स्वयं मनोविकार को स्थायी भाव, उसके अन्य पोषक भावों को व्यभिचारी भाव एवं तजन्य कार्य को अर्नुभाव कहते हैं । सो “विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी' भाव की सहायता से जब स्थायी भाव उत्कट अवस्था को प्राप्त हो मनुष्य के मन में अनिर्वचनीय आनंद को उमजाता है, तब उसे रस कहते हैं" (रसु-वाटिका, पृष्ठ ७)। हमारे प्राचीन साहित्य-शास्त्र प्रणेताओं ने विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों की सहायता से स्थायी भावों के पूर्ण विकास का खूब मनन किया है । इसी के फल-स्वरूप उन्होंने नव रस निर्धारित किए हैं और इन नर्व रसों में भी शृंगार, वीर और शांत को प्रधानता दी है। फिर इन तीनों में भी, उनकी राय के अनुसार, श्रृंगार ही सर्वश्रेष्ठ है। " श्रृंगार-रस में ही सब अनुभाव, विभाव, व्यभिचारी भाव पूर्ण प्रकाश प्राप्त कर पाते हैं ; अन्य रसों में वे विकलींग रहते हैं। शृंगार-रस का स्थायी भाव 'रति' और सभी रसों के स्थायियों से अच्छा है । रति (प्रेम) में जो व्यापकता, सुकुमारता, स्वाभा- विकता, संपादकत्व सृजन-शक्ति और प्रात्मत्याग के भाव है वे अन्य स्थायियों में नहीं हैं । नर-बारी की प्रीति में प्रकृति और पुरुष