पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/७२

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देव और विहारी प्रत्येक वस्तु का सदुपयोग भी होता आया है और दुरुपयोग भी । अतएव स्त्री-पुरुष की पवित्र प्रीति पर भी दुराचारियों ने कलंक-कालिमा पोती है ; परंतु इससे उस प्रीति की महत्ता तथा स्थायित्व नष्ट नहीं हो सकता। शृंगार-रस की कविता नायक-नायिका की इस प्रीति-सरिता में खूब ही नहाई है। संसार के सभी नामी कवियों ने इसका श्रादर किया है। देववाणी संस्कृत में शृंगार-कविता का बड़ा बल रहा है। हिंदी-भाषा का प्राचीन साहित्य इसी कविता की अधिकता के कारण बदनाम भी किया जाता है। अँगरेज़ विद्वान् महामति शेली की सम्मति है कि नारी-जाति की स्वतंत्रता ही प्रेम-कविता का मूल है । वे तो इस हद तक, जाने को तैयार है कि पुरुष और स्त्री में जो कुछ परस्पर बराबरी का भाव है, वह इसी प्रेम कविता के कारण हुआ है । पुरुष स्त्रियों को अपने से हीन समझते थे, परंतु प्रेम के प्रभाव से प्रेम-कविता से जाग्रत् हो-वे नारी-जाति की बराबरी का अनुभव करने लगे। स्वयं शेली महोदय का कथन उद्धत करना हम उचित समझते हैं- " Freedom of women produced the poetry of sexual love. Love became a religion, the xdols of whose worship were ever present.........The Provincial Trouveurs or inventors preceded Petrarcb, whose verses are as spells which unseal the inmost enchanted fountains of the delight which is in the grief of बिमल मुद्ध सिंगार-रसु "देव" अकास अनंत ; उदि-उड़ि खग-ज्यों और रस बिबस न पावत अंत। भलि कहत नव रस सुकबि, सकल मूल सिंगार; बामपति दपतिन की, जाको जग बिस्तार । शब्द-रसायन