पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/८६

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देव और विहारी नीलोत्पल भी है। नीलोत्पल भी साधारण नहीं हैं-विकसित हैं और सुभग भी । इन्हीं का तोरण तनता है। यौवन के शुभा- गमन में तोरण का तनना कितना अच्छा है ! स्वागत की कितनी मनोहारिणी सामग्री है ! 'तरल' में अवता और वंचलता का कैसा शुभ समावेश है। ___"तरल तनाइयत तोरन तिते-तित" में उक्त समालोचक के 'तुक्कड़' कवि ने कैसा अनोखा अनुप्रास-चमत्कार दिखलाया है ! तो क्या परवर्ती कवि पूर्ववर्ती कवि से आगे निकल गया है ? हमारी राय में तो अवश्य आगे निकल गया है, वैसे तो अपनी-अपनी रुचि है । साहित्य-भवन-निर्माण करते समय यदि हम अन्यत्र का मसाला लाकर अपने भवन में लगावें और अपने भवन के अन्य मसाले में उसे बिलकुल मिला दें--ऐसा न हो कि अतलस के कुर्ते में मुंज की बखिया हो जाय-तो हमको अधिकार है कि अन्यत्र से लाया हुग्रामसाला अपने भवन में लगा लें। वास्तव में, ऐसी दशा में, हमीं उस मसाले का उपयोग कर सकते हैं। यदि हम उस मसाले को अपनी जानकारी से और भी अच्छा कर सकें, तो कहना ही क्या ! उपर्युक्त उदाहरण में परवर्ती कचि ने यदि पूर्ववर्ती कवि का भाव लिया भी हो, तो भी उसने उसे विशेष चमत्कृत अवश्य कर दिया है। अतः उच्च-साहित्य के न्यायालय में वह चोरी के अभियोग में दंडित नहीं हो सकता । कहने का तात्पर्य यह कि ऐसे भाव-सादृश्य में परवर्ती कवि पर चोरी का दोप न आरो- पित करना चाहिए । परवर्ती कवि ने पूर्ववर्ती कवि के भाव का स्पष्टीकरण नहीं किया है बरन् उसके सौंदर्य को सुधारा है। वह चोर नहीं बल्कि सौंदर्य-सुधारक है । 'काव्य-निर्णय' के लिये उसे दूसरे का 'काव्य-सरोज' नहीं सूंघना पड़ा है। उसके पास स्वयं विकसित नलिोत्पल मौजूद है। तीसरा उदाहरण भी लीजिए-