पृष्ठ:नव-निधि.djvu/१११

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नव-निधि


सत्य कहता हूँ, मुझे तो हृदय से प्रसन्नता ही हुई। यह काम तो बेलामवालों के लिए है, घर न बैठे रहे यहीं वेगार की। मेरी मूर्खता थी कि मैं इतने दिनों तक आँखें बन्द किये बैठा रहा।" परन्तु सेठजी की मुखाकृति ने इन विचारों का प्रमाण न दिया। मुखमण्डल हृदय का दर्पण है, इसका निश्चय अलबत्ता हो गया।

किन्तु बाबू रामरक्षा बहुत देर तक इस आनन्द का मजा न लूटने पाये और न सेठजी को बदला लेने के लिए बहुत देर तक प्रतीक्षा करनी पड़ी । सभा विसर्जित होते ही जब बाबू रामरक्षा सफलता के उमंग में ऐंठते, मोछ पर ताव देते और चारों ओर गर्व की दृष्टि डालते हुए बाहर आये, तो दीवानी के तीन सिपाहियों ने आगे बढ़कर उन्हें गिरफ्तारी का वारण्ट दिखा दिया। अबकी बाबू रामरक्षा के चेहरे का रंग उतर जाने की और सेठजी के इस मनोवांछित दृश्य से आनन्द उठाने की बारी थी। गिरधारीलाल ने आनन्द की उमंग में तालियाँ तो न बजाई, परन्तु मुसकुराकर मुँह फेर लिया। रङ्ग में भङ्ग पड़ गया।

आज इस विजय के उपलक्ष्य में मुंशी फैजुलरहमान ने पहले से एक बड़े समारोह के साथ गार्डनपार्टी की तैयारियाँ की थी। मिस्टर रामरक्षा इसके प्रबन्धकर्ता थे। अाज की 'आफ्टर डिनर स्पीच' उन्होंने बड़े परिश्रम से तैयार की थी, किन्तु इस वारट ने सारी कामनाओं का सत्यानाश कर दिया। यो तो बाबू साहब के मित्रों में ऐसा कोई भी न था नो दस हज़ार रुपये की जमानत दे देता, अदा कर देने का तो विक्र ही क्या, किन्तु कदाचित् ऐसा होता भी तो सेठजी अग्ने को भाग्यहीन समझते। दस हजार रुपया और म्युनिसिपैलिटी की प्रतिष्ठित मेम्बरी खोकर उन्हें इस समय यह हर्ष प्राप्त हुआ था।

मिस्टर रामरक्षा के घर पर ज्यों ही यह खबर पहुँची, कुहराम मच गया। उनकी स्त्री पछाड़ खाकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। जब कुछ होश में आई तो रोने लगी, और रोने से छुट्टी मिली तो उसने गिरधारीलाल को कोसना प्रारम्भ किया। देवी-देवता मनाने लगी। उन्हें रिशवतें देने पर तैयार हुई कि वे गिर-धारीलाल को किसी प्रकार निगल जायँ । इस बड़े भारी काम में वह गंगा और यमुना से सहायता मांग रही थी, प्लेग और विसूचिका की खुशामदें कर रही थी