पृष्ठ:नव-निधि.djvu/११४

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ममता


कर सकूँ। किन्तु जो काम मेरे योग्य हो, जो कुछ मेरे किये हो सकता हो, उसके करने के लिए मैं सब भाँति से तैयार हूँ। यहाँ सेठ-साहूकारों ने मुझे बहुत बदनाम कर रखा है। मैं सबकी आँखों में खटकता हूँ। उसका कारण सिवा इसके और कुछ नहीं कि जहाँ वे लोग लाभ पर ध्यान रखते हैं ; वहाँ मैं भलाई पर ध्यान रखता हूँ। यदि कोई बड़ी अवस्था का वृद्ध मनुष्य मुझसे कुछ कहने-सुनने के लिए आता है तो विश्वास मानो, मुझसे उसका वचन टाला नहीं जाता। कुछ तो बुढ़ापे का विचार, कुछ उसके दिल टूट जाने का डर, कुछ यह ख्याल कि कहीं यह विश्वासघातियों के फन्दे में न फँस जाय, उसकी इच्छाओं की पूर्ति के लिए विवश कर देता है। मेरा यह सिद्धान्त है कि अच्छी जायदाद और कम ब्याज। किन्तु इस प्रकार की बातें आपके सामने करना व्यर्थ है। आपसे तो घर का मामला है। मेरे योग्य जो कुछ कार्य हो उसके लिए सिर ऑखों से तैयार हूँ।

वृद्ध स्त्री -- मेरा कार्य आप ही से हो सकता है।

सेठजी -- (प्रसन्न होकर) बहुत अच्छा, आज्ञा दो।

स्त्री -- मैं आपके सामने भिखारिनी बनकर आई हूँ। आपको छोड़कर कोई मेरा सवाल पूरा नहीं कर सकता।

सेठजी -- कहिए, कहिए।

स्त्री -- आप रामरक्षा को छोड़ दीजिए।

सेठजी के मुख का रंग उतर गया। सारे हवाई किले जो अभी-अभी तैयार हुए थे, गिर पड़े। वे बोले -- उसने मेरी बहुत हानि की है। उसका घमंड तोड़ डालूँगा तब छोडूँगा।

स्त्री -- तो क्या मेरे बुढ़ापे का, मेरे हाथ फैलाने का और कुछ अपनी बड़ाई का विचार न करोगे ? बेटा, ममता बुरी होती है। संसार से नाता टूट जाय, धन जाय, धर्म जाय, किन्तु लड़के का स्नेह हृदय से नहीं जाता। संयोग सब कुछ कर सकता है, किन्तु बेटे का, स्नेह हृदय से नहीं निकल सकता। इस पर हाकिम का, राजा का यहाँ तक कि ईश्वर का भी बस नहीं है। तुम मुझ पर तरस खाओ। मेरे लड़के की जान छोड़ दो, तुम्हें बड़ा यश मिलेगा। मैं जब तक जीऊँगी तुम्हें आशीर्वाद देती रहूँगी।