पृष्ठ:नव-निधि.djvu/२१

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नव-निधि

गया हो। मेरा अपराध क्या है? मुझपर इतना बड़ा दोष क्यों लगाया जाता है? केवल थालों के बदले जाने से? हे ईश्वर! मैं किससे अपना दुःख कहूँ? तू ही मेरा साक्षी है। जो चाहे सो हो, पर मुझसे यह पाप न होगा।

रानी ने फिर सोचा––राजा, क्या तुम्हारा हृदय ऐसा ओछा और नीच है? तुम मुझसे हरदौल की जान लेने को कहते हो? यदि तुमसे उसका अधिकार और मान नहीं देखा जाता, तो क्यों साफ़-साफ़ ऐसा नहीं कहते? क्यों मरदों की लड़ाई नहीं लड़ते? क्यों स्वयं अपने हाथ से उसका सिर नहीं काटते और मुझसे वह काम करने को कहते हो? तुम खूब जानते हो, मैं नहीं कर सकती। यदि मुझसे तुम्हारा जी उकता गया है, यदि मैं तुम्हारी जान की जंजाल हो गई हूँ, तो मुझे काशी या मथुरा भेज दो। मैं बेखटके चली जाऊँगी। पर ईश्वर के लिए मेरे सिर इतना बड़ा कलंक न लगने दो। पर मैं जीवित ही क्यों रहूँ? मेरे लिए ऋत्र जीवन में कोई सुख नहीं है। अब मेरा मरना ही अच्छा है। मैं स्वयं प्राण दे दूंगी, पर यह महापाप मुझसे न होगा। विचारों ने फिर पलटा खाया। तुमको पाप करना ही होगा। इससे बड़ा पाप शायद आज तक संसार में न हुआ हो; पर यह पाप तुमको करना होगा। तुम्हारे पतिव्रत पर सन्देह किया।मा रहा है और तुम्हें इस सन्देह।को मिटाना होगा। यदि तुम्हारी जान जोखि में होती, तो कुछ हर्ज न था अपनी जान देकर हरदौल को बचा लेती। पर इस समय तुम्हारे पतिव्रत पर आँ व पा रही है। इसलिए तुम्हें यह पाप करना ही होगा और पाप करने के बाद हँसना और प्रसन्न रहना होगा। यदि तुम्हारा चित्त तनिक भी विचलित हुआ, यदि तुम्हारा मुखड़ा ज़रा भी मद्धिम हुआ, तो इतना बड़ा पाप करने पर भी तुम सन्देह भिटाने में सफल न होगी। तुम्हारे जी पर चाहे जो बीते, पर तुम्हें यह पाप करना ही पड़ेगा। परंतु कैसे होगा? क्या मैं हरदौल का सिर उतारूँगी? यह सोचकर रानी के शरीर में कँपकँपी आ गई। नहीं मेरा हाथ उसपर कभी नहीं उठ सकता। प्यारे हरदौल, मैं तुम्हें विष नहीं खिला सकती मैं मानती हूँ, तुम मेरे लिए श्रानन्द से विष का बीड़ा खा लोगे। हाँ, मैं जानती हूँ, तुम 'नहीं' न करोगे। पर मुझसे यह महापाप नहीं हो सकता; एक बार नहीं, हजार बार नहीं हो सकता।