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नव-निधि


की चेरी हूँ। ओरछे में मैं वह थी जो अवध में कौशल्या थीं : यहाँ मैं बादशाह के एक सेवक की स्त्री हूँ। जिस बादशाह के सामने आज आप आदर से सिर झुकाते हैं वह कल आपके नाम से काँपता था। रानी से चेरी होकर भी प्रसन्न-चित्त होना मेरे वश में नहीं है। आपने यह पद और ये विलास की सामग्रियाँ बड़े महँगे दामों मोल ली हैं।

चम्पतराय के नेत्रों पर से एक पर्दा-सा हट गया। वे अब तक सारन्धा की अात्मिक उच्चता को न जानते थे। जैसे बे-मा-बाप का बालक मा की चर्चा सुनकर रोने लगता है, उसी तरह ओरछे की याद से चम्पतराय की आँखें सजल हो गई। उन्होंने आदरयुक्त अनुराग के साथ सारन्धा को हृदय से लगा लिया।

आप से उन्हें फिर उसी उजड़ी बस्ती की फिक्र हुई जहाँ से धन और कीर्ति की अभिलाषाएँ खींच लाई थीं।

मा अपने खोये हुए बालक को पाकर निहाल हो जाती हैं। चम्पतराय के आने से बुन्देलखण्ड निहाल हो गया। ओरछे के भाग जागे। नौबतें भड़ने लगी और फिर सारन्धा के कमल-नेत्रों में जातीय अभिमान का आभास दिखाई देने लगा!

यहाँ रहते-रहते महीने बीत गये। इसी बीच में शाहजहाँ बीमार पड़ा। पहले से ईर्ष्या की अग्नि दहक रही थी। यह ख़बर सुनते ही ज्वाला प्रचण्ड हुई। संग्राम की तैयारियाँ होने लगीं। शाहजादा मुराद और मुहीउद्दीन अपने-अपने दल सजाकर दक्खिन से चले। वर्षा के दिन थे। उर्बरा भूमि रंग-विरंग के रूप भरकर अपने सौन्दर्य को दिखाती थी।

मुराद और मुहीउद्दीन उमंगों से भरे हुए कदम बढ़ाते चले आये थे। यहाँ तक कि वे धौलपुर के निकट चम्बल के तट पर आ पहुँचे ;परन्तु यहाँ उन्होंने बादशाही सेना को अपने शुभागमन के निमित्त तैयार पाया।

शाहमादे अब बड़ी चिन्ता में पढ़े। सामने अगम्य नदी लहरें मार रही थी,किसी योगी के त्याग सदृश। विवस होकर चंपतराय के पास संदेश भेजा कि खुदा के लिए प्राकर हमारी डूबती हुई नाव को पार लगाइए।

राजा ने भवन में जाकर सारन्धा से पूछा-इसका क्या उत्तर दूँ !