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नव-निधि
 

रानी -- एक जवान पुत्र।

राजा को बाण-सा लगा! पूछा-कौन? अंग राय?

रानी नहीं?

राजा -- रतनशाह?

रानी -- नहीं।

राजा-छत्रसाल?

रानी-हाँ।

जैसे कोई पक्षी गोली खाकर परों को फड़फड़ाता है और तब बेदम होकर गिर पड़ता है,उसी भाँति चम्पतराय पलँग से उछले और फिर अचेत होकर गिर पड़े। छत्रसाल उनका परम प्रिय पुत्र था। उनके भविष्य की सारी काम-नाएँ उसी पर अवलम्बित थीं। जब चेत हुश्रा तब बोले,"सारन,तुमने दुरा किया। अगर छत्रसाल मारा गया तो बुंदेला बंश का नाश हो जायगा।"

अँधेरी रात थी। रानी सारन्धा घोड़े पर सवार चम्पतराय को पालकी में बैठाये किले के गुप्त मार्ग से निकली जाती थी। आज से बहुत काल पहले एक दिन ऐसी ही अँधेरी,दुःखमयी रात्रि थी। तब सारन्धा ने शीतलादेवी को कुछ कठोर वचन कहे थे। शीतलादेवी ने उस समय जो भविष्यवाणी की थी,वह आज पूरी हुई। क्या सारन्धा ने उसका जो उत्तर दिया था,वह भी पूरा होकर रहेगा?

मध्याह्न था। सूर्यनारायण सिर पर आकर अग्नि की वर्षा कर रहे थे। शरीर को झुलसानेवाली प्रचण्ड,प्रखर वायु वन और पर्वत में आग लगाती फिरती थी। ऐसा विदित होता था मानों अग्निदेव की समस्त सेना गरजती हुई चली आ रही है। गगन मण्डल इस भय से काँप रहा था। रानी सारन्धा घोड़े पर सवार,चम्पतराय को लिये,पश्चिम की तरफ़ चली जाती थी। ओरछा दस कोस पीछे छूट चुका था और प्रतिक्षण यह अनुमान स्थिर होता जाता था कि अब हम भय के क्षेत्र से बाहर निकल आये। राजा पालकी में अचेत पड़े हुए थे और कहार पसीने में सराबोर थे। पालकी के पीछे पाँच सवार घोड़ा बढ़ाये चले