पृष्ठ:नव-निधि.djvu/४४

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मर्यादा की वेदी

झालावाड़ में बड़ी धूम थी। राजकुमारी प्रभा का आज विवाह होगा। मन्दार से बारात आयेगी। मेहमानों के सेवा-सम्मान की तैयारियाँ हो रही थीं। दुकानें सजी हुई थीं। नौबतखाने आमोदालाप से गूँजते थे। सड़कों पर सुगन्धि छिड़की जाती थी। अट्टालिकाएँ पुष्प लताओं से शोभायमान थीं। पर जिसके लिए ये सब तैयारियाँ हो रही थीं, वह अपनी बाटिका के एक वृक्ष के नीचे उदास बैठी हुई रो रही थी।

रनिवास में डोमिनियाँ आनन्दोत्सव के गीत गा रही थी। कहीं सुन्दरियों के हाव-भाव थे, कहीं आभूषणों की चमक-दमक, कहीं हास परिहास की बहार। नाइन बात-बात पर तेज़ होती थी। मालिन गर्व से फूली न समाती थी। धोबिन आँखें दिखाती थी। कुम्हारिन मटके के सदृश्य फूली हुई थी। मण्डप के नीचे पुरोहितजी बात-बात पर सुवर्ण मुद्राओं के लिए ठुनकते थे। रानी सिर के बाल खोले भूखी-प्यासी चारों ओर दौड़ती थी। सबकी बौछारें सहती थी और अपने भाग्य को सराहती थी। दिल खोलकर हीरे-जवाहिर लुटा रही थी। आज प्रभा का विवाह है, बड़े भाग्य से ऐसी बातें सुनने में आती है। सब-के-सब अपनी-अपनी धुन में मस्त हैं। किसी को प्रभा की फ़िक्र नहीं है, जो वृक्ष के नीचे अकेली बैठी रो रही है।

एक रमणी ने आकर नाइन से कहा -- बहुत बढ़-बढ़कर बातें न कर, कुछ राजकुमारी का भी ध्यान है ? चल उनके बाल गूँथ।

नाइन ने दाँतों तले जीभ दबाई। दोनों प्रभा को ढूँढती हुई बाग में पहुँची। प्रभा ने उन्हें देखते ही आँसू पोछ डाले। नाइन मोतियों से माँग भरने लगी और प्रभा सिर नीचा किये आँखों से मोती बरसाने लगी।

रमणी ने सजल-नेत्र होकर कहा -- बहिन, दिल इतना छोटा मत करो। मुँहमाँगी मुराद पाकर इतनी उदास क्यों होती हो ?

प्रभा ने सहेली की ओर देखकर कहा -- बहिन, न जाने क्यों दिल बैठा जाता है। सहेली ने छेड़कर कहा -- पिया-मिलन की बेकली है !

प्रभा उदासीन भाव से बोली -- कोई मेरे मन में बैठा कद रहा है कि अब उनसे मुलाकात न होगी।