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नव-निधि


विचार, वायु और बिजली की व्यप्रता के साथ,उसके मस्तिष्क में दौड़े। वह तीव्र स्वर से बोली - भीतर मत प्रायो।

राजकुमार ने पूछा - मुझे पहचाना नहीं ?

प्रभा - खूब पहिचान लिया, किन्तु यह बातें करने का समय नहीं है। राणा तुम्हारी घात में हैं। अभी यहाँ से चले जाओ।

राजकुमार ने एक पग और आगे बढ़ाया और निर्भीकता से कहा - प्रभा, तुम मुझसे निष्ठुरता करती हो।

प्रभा ने धमकाकर कहा-तुम यहीं टाहरोगे तो मैं शोर मचा दूंगी।

राजकुमार ने उद्दण्डता से उत्तर दिया-इसका मुझे भय नहीं। मैं अपनी जान हथेली पर रखकर आया हूँ। आज दोनों में से एक का अन्त हो मायगा। या तो राणा रहेंगे या मैं रहूँगा। तुम मेरे साथ चलोगी?

प्रभा ने दृढ़ता से कहा - नहीं।

राजकुमार व्यंगभाव से बोला - क्यों, क्या चित्तौड़ का जल वायु पसन्द आ गया ?

प्रभा ने राजकुमार की ओर तिरस्कृत नेत्रों से देखकर कहा--संसार में अपनी सब आशाएँ पूरी नहीं होती। जिस तरह यहाँ मैं अपना जीवन काट रही हूँ,वह मैं ही जानती हूँ। किन्तु लोक निन्दा भी तो कोई चीज़ है। संसार की दृष्टि में चित्तौड़ की रानी हो चुकी। अब राणा जिस भाँति रखें उसी भाँति रहूँगी। मैं अन्त समय तक उनसे घृणा करूँगी, जलूँगी, कुढंगी। जब जलन न सही जायगी, विष खा लूगी या छाती में कटार मारकर मर जाऊँगी। लेकिन इसी भवन में। इस घर के बाहर कदापि पैर न रखेंगी।

राजकुमार के मन में सन्देह हुआ कि प्रभा पर राणा का वशीकरण मन्त्र चल गया। यह मुझसे छल कर रही है। प्रेम की जगह ईर्ष्या पैदा हुई। वह उस भाव से बोला - और यदि मैं यहाँ से उठा ले जाऊँ ? प्रभा के तीवर बदल गये। बोली - मैं तो वही करूँगी जो ऐसी अवस्था में क्षत्राणियाँ किया करती हैं। अपने गले में छूरी मार लूँगी, या तुम्हारे गले में।

राजकुमार एक पग और आगे बढ़ाकर यह कटु - वाक्य बोला - राणा के साथ तो तुम खुशी से चली आई। उस समय यह छुरी कहाँ गई थी।