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नव-निधि

इसकी उम्र २५ साल से अधिक न थी,पर रंग पीला था। आँखें बड़ी और ओठ सूखे। चाल-ढाल में कोमलता थी और उसके डील-डौल का गठन बहुत ही मनोहर था। अनुमान से जान पड़ता था कि समय ने इसकी यह दशा कर रखी है पर एक समय वह भी होगा जब यह बड़ी सुन्दर होगी। इस स्त्री ने आकर चौखट चूमी और आशीर्वाद देकर फर्श पर बैठ गई। राजनन्दिनी ने इसे सिर से पैर तक बड़े ध्यान से देखा और पूछा, "तुम्हारा नाम क्या है ?"

उसने उत्तर दिया,"मुझे व्रजविलासिनी कहते हैं।"

"कहाँ रहती हो ?"

"यहाँ से तीन दिन की राह पर एक गाँव विक्रमनगर है,वहाँ मेरा घर है।"

"संस्कृत कहाँ पढ़ी है?"

"मेरे पिताजी संस्कृत के बड़े पण्डित थे,उन्हीं ने थोड़ी-बहुत पढ़ा दी है।"

"तुम्हारा व्याह तो हो गया है न ?”

ब्याह का नाम सुनते ही व्रजविलासिनी की आँखों से आँसू बहने लगे। वह आवाज़ सम्हालकर बोली-इसका जवाव में फिर कभी ट्रॅगी, मेरी गमकहानी बड़ी दुःखमय है। उसे सुनकर आपको दुःख होगा, इसलिए इस समय क्षमा कीनिए।

आज से बजविलासिनी वहीं रहने लगी। संस्कृत-साहित्य में उसका बहुत प्रवेश था। वह राजकुमारियों को प्रतिदिन रोचक कविता पढ़कर सुनाती थी। उसके रंग,रूप और विद्या ने धीरे-धीरे राजकुमारियों के मन में उसके प्रति प्रेम और प्रतिष्ठा उत्पन्न कर दी । यहाँ तक कि राजकुमारियों और व्रजविलासिनी के बीच बड़ाई-छुटाई उठ गई और वे सहेलियों की भाँति रहने लगीं।

कई महीने बीत गये। कुँवर पृथ्वीसिंह और धर्मसिंह दोनों महाराज के साथ अफ़गानिस्तान की मुहीम पर गये हुए थे। यह विरह की घड़ियाँ मेवदूत और रघुवंश के पढ़ने में कटी। व्रजविलासिनी को कालिदास की कविता से बहुत प्रेम था और वह उनके काव्यों की व्याख्या ऐसी उत्तमता से करतो और उसमें ऐसी बारीकियाँ निकालती कि दोनों राजकुमारियाँ मुग्ध हो जाती।

एक दिन संध्या का समय था,दोनों राजकुमारियाँ फुलवाड़ी में सैर करने