पृष्ठ:नागरी प्रचारिणी पत्रिका.djvu/१०

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'छिताई-चरित'

'छिताई-चरित' १४ किया, जिसे नुसरत स्वाँ ने फरता से दवाया। विद्रोह में नुसरत का माई भी मारा गया था। विद्रोह का समाचार अब दिल्लो पहुँखा तब उसे दबाने के लिये कड़ी से कड़ी काररवाई करने का आदेश मिला। नुसरत खाँ ने भाई का बदला लेने को जो कुछ किया वह इतिहास में बेजोड़ है। पुरुषों का बदला स्त्रियों और बच्चों से लिया गया। त्रियों की बेइज्जती में क्या क्या नहीं किया गया। उसका वर्णन करने में उसके सजातीय इतिहासकों ने भी लज्जा और लेखनी के कलुषित होने का अनुभव किया है। संभव है इस विद्रोह को ही उसने दूसरा युद्ध समझ लिया हो। देवगिरि पर हुए दूसरे आक्रमण के समय उलुग खाँ और नुसरत बाँ मर चुके थे। पर खुसरो ने इन दोनों व्यक्तियों का उस समय वहाँ रहना बताया है। कथा ने उलुग खाँ के जीवित रहने का संकेत तो दिया है, किंतु उसका दिल्ली में होना कहा है। उसमें नुसरत खाँ का उस अवसर पर उल्लेख नहीं। फिर 'छिताई कथा' और 'माशिका' को एक कैले करें। इतिहास को रामदेव की कन्या के नाम का शान नहीं। कथा मे उसे छिताई नाम से पुकारा है। यही नाम 'पदमावत', 'वीरसिंहदेववरिष आदि में भी है। जान कवि ने इसे 'छीता' कहा है, जो छिताईका संक्षिप्त रूप है। इतिहास में छिताई से मिलते जुलते 'खिताई' नाम: नगर का उल्लेख है। रशीदुद्दीन 'जामिउत् तवारीख' में लिखता है कि 'खिताई' होकर मावार से (इसकी राजधानी द्वारसमुद्र है) जो सड़क आई है वह कायल तक जाती है। और 'क' का मूल संस्कृत 'क्ष' तो नहीं है । संस्कृत 'क्षिता' (पृथ्वी ) से इसका कोई संबंध तो नहीं ! 'पीता तो उसके बहुत निकट है। 'भाई' का योग तो बात हो जाया करता है। कन्हाई, मधाई इसके प्रमाण हैं। कर्णाटक इतिहास के एक विशेषज्ञ से पता चला है कि द्वारसमुद्र के तृतीय वीर बस्तान की रानी का नाम किकाइ या चिकाइताइ था, जो तुलुषा राजवंश की कन्या थी। १-~इसकी रचना का विशेष ऐतिहासिक महत्व नहीं है। इसने 'झोता प्रेमी का नाम 'राम' लिखा है और उसे उत्तर का कोई राजकुमार बताया है। काशी नागरीप्रचारिणी पभा में सुरक्षित खोज-विवरण, संख्या ३६, सन् १९४५ (अप्रकाशित)। ५-सर एक० एम. इलियट तथा प्रोफेसर जाम अउसनकृत विस्ही भाव- इंडिया ऐअ टोल्ड बाइ इट्स प्रोन हिस्टोरियंस, प्रथम भाग, पृष्ठ ७३ । १-मालेका पोश, १९ ३६५