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नागरीप्रचारिणी पत्रिका


की कुछ भयंकर भले है' पर इसी से सारी कृति को असत्य ठहरा देना उचित नहीं । देवलदेवी की षय आदि अनुमित होगी। इसी से पुराने सभी इतिहासकार देवलदेवा की कथा को सत्य मानते हैं।

किंकेड और पारसनीस ने देवलदेवी को भी देवगिरि के आक्रमण का कारण माना है। पर गुजगत पर आक्रमण के दस वर्ष बाद देवगिरि पर चढ़ाई क्यों?

किसी को देवलदेवी और छिनाई की कथाओं के कुछ साम्य से उनके एक होने का संदेह हो सकता है। संदेह के दो होकारण प्रधान होंगे-

(१) हिदू-बेगम की प्रेरणा से छिताई के लिये प्रयत्न करना ।

(२) दर्शन को जाते समय मार्ग में छिनाई का पकड़ा जाना।

पहले के सबंध में कहना यह है कि देवलदेवी और कमलावती या कमलादेखो में पुत्री और माता का सांध था। अपत्य प्रेम को प्रेरणा स्वाभाविक है।पर हैमति और छिनाई से पसा कोई संबंध नहीं, क्या मोह न मारि नारि के रूपा' का भी स्मरण दिलाया जाय ? खुसरो के अनुसार अनुसार देवलदेवी देवगिरि में ब्याही जाने को थी, तब तो आक्रमण रामदेव की पुत्रवधू के लिये होता, पुत्री के लिये नहीं।

रही दूसरी बात ! खुसगे के अनुसार नो गिरफ्तारी के समय देवलदेवी देवगिरि लाई जा रही थी, इधर छिताई उस समय देवगिरि में ही थी। दोनों की कथाओं के परिणाम में तो साम्य का लेश भी नहीं। कहाँ देवनदेवी का विवाह खिज्र स्वाँ से और कहाँ छिताई का न्यास गषवचेतन के यहाँ और दैनिक व्यय के लिये भारी रकम का निश्चय ! विवाहिता और अविवाहिता का भेद ऊपर से!

'आशिका' में अमीर खुसरो ने गुजरात पर दो बार आक्रमण होना बताया है। किंतु इतिहास से एमा प्रमाणित नहीं होता, स्वयं खुसरो लिखित 'तारीखे-अलाई' से भी नहीं। राय कर्ण के भाग जाने के बाद फिर से गुजरात जीतने का भी काई उल्लेख इतिहास में नहीं। जान पड़ता है कि खुसरो ने प्रथम आक्रमण के ही दो भाग कर दिए हैं---(१)राय कर्ण को जीतना और ( २ ) तत्पश्चात् हुए विद्रोह को दबाना । राय कर्ण के भाग जाने के बाद कुछ सैनिकों ने लूट में हिस्सा बेटाने के लिये विद्रोह

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१---(क) नागरी प्रचारिणी पत्रिका ( नवीन संस्करण ) भाग ११, अंक ४ में श्री जगनसान गुप्त लिखित 'देव नदेवी और खिजव', बारहवा निबंध, पृष्ठ ४०७ ।

(ख) शाहपूरशाह होरमसजी होदीवालाकृत स्टडीज इन इंडो-मुसलिम हिस्टी, सम् १९३९ ई० का संस्करण, पृष्ठ ३६८-३१४ ।