पृष्ठ:नागरी प्रचारिणी पत्रिका.djvu/२६

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चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की पश्चिमोत्तरी विजय-यात्रा

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य को पश्चिमोत्तरी विजय-यात्रा ११ -विशेषतः अंगूरों-की तो वह खान है। वहाँ को कापिशायिनी मदिराका उल्लेख कौटिलीय अर्थशास्त्र' में मिलता है। अतः युद्ध में विजय प्राप्त कर भारतीय सैनिकों ने अपने अतुलित मानंद और उल्लास को मधुपान एवं मस्ती में प्रकट किया और बहुमूल्य सिमरों का खूब प्रयोग किया।' यह विजय वस्तुतः भारतीयों के लिये अपूर्व गौरव की वस्तु थी।

यह इलाका माजकल वाख-बान कहलाता है और कश्मीर की सीमाभों से सटा हुआ है। इससे उत्तर-पूर्व की ओर दजला नदी के अर्धचंद्राकार घुमाव में परिबद्ध बदख्शों का प्रदेश है। बल्ब से बदस्यों होती एक सड़क खुराल प्रदेश में जाती है, जो दजला और वक्षाह के संगम से जरा पूर्व की भोर है। चंद्रगुप्त ने पल्स से उत्तर-पूर्व की मोर जानेवाली सड़क पकड़ी, जो बदख्शा और वाख खान से गुजरती हुई वक्षाह नदी की अंतर्वेदी में पहुंचती है। उन्होंने जरा पश्चिमोत्तर की मोर जानेवाली सड़क छोड़ दो, जो सुग्द (यूनानियों का सोदियाना ) प्रदेश में चली जाती है, क्योंकि इधर कोई ऐसो शक्तिशाली राज-सत्ता नहीं थी और मार्ग भी कुछ अधिक दुर्गम था। इसके विपरीत सरी तरफ इण और कंबोज जैसे दुर्दात शत्रु मौजूद थे और रास्ता भी अपेक्षाकृत सरला था।

वक्षाहर को वादी में हूण बसते थे। धोनी सम्राट शि:-हाँग-ती ने सा मे २४६ वर्ष पूर्व इन्हें चीन से निकाल दिया था। इसके बाद मंगोलिया इनका गढ़ बन गया था। धोरे धीरे ये पश्चिम की ओर बढ़ने लगे और वक्षाह एवं दजला को यादो में बस गए। ईसवी सन् ३५० में इन्होंने दजला को पारकर पारसी-साम्राज्य पर आक्रमण किया, परंतु सासानी सम्राट शाहपुर ने इन्हें परास्त कर दिया। इसके बाद ये सासानियों के मित्र बन गए और रोम के आक्रमण में इन्होंने शाहपुर को सहायता भी की। इनकी मंत्री बहुत दृढ़ थी। शायद सासानी साम्राज्य पर गुप्त-माक- मण होने पर इन्होंने फिर अपने मित्र पारसियों की सहायता की हो। इसी लिये चंद्रगुप्त को इनके खिलाफ लड़ना पड़ा। वताह की वादी में फिर

१-विनयन्ते स्म तद्योषा मधुभिर्विजयभ्रमम् । भास्तीर्णाजिनरत्नासु द्राक्षावलयमिषु ॥ ६५ ।। यही

१-कालिदास ने इसे 'वंक्षु' कहा है। कुछ विद्वानों का पिगरी कि भाक्सम्ही बंच है। परंतु यह गलत है । माक्सस् बहुत बड़ी नदी है, जो पामीर से निकल कर मध्य एशिया को पार करती हुई बहती है। वंतु भाक्सस् नहीं है, बल्कि आक्सस् की एक भारा है, जो भाक्सस् में मिलती है । इसका नाम वक्षाह है।

       -इंग्यिन एंटिक्वेरी, सन् १९१९ पृष्ठ ७५