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पृष्ठ:निबन्ध-नवनीत.djvu/१४६

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(१) मयदानव (२) नामधर लेते थे। आप ब्लैक, डैमडफूल वन फे फूल से खिल जाते है कि इन अधरों से भला इतना तो भी सुना । अभी तो श्राप हल बात पर हंसते होगे कि हम भी फिस मुल्क में उत्पन्न हुए, जहा लोग जहाज पर नहीं बढते, जहा राडे होके नहीं मुतते जहां लोग हाइड्मपार्क (३) की सैर नहीं करते, जहा स्त्री स्वच्छन्द नहीं विचरती, जहा कागज का एक काम तो तोगी को विदित ही नहीं, देवल लिखने, छपने, टोपी बनने गादि के ही काम में आग है इत्यादि । पर यह न समझते होंगे कि हमारे देश की एक रीति पर चाहे और देश के प्रादमी असभ्यता का दोष गरोपण करें, किन्तु कुछ नहीं, कहीं धूलि के उडने से भानु प्रतापहीन होने है। हा इतना तो हो जाता है कि भानु दिखाई न दें। पर ज्योंही धूलि हटी त्योही भगवान धैले के वैसे ही। सिविलसनिस है तो सर्विस ही न, फिर क्यों उसके लिए बिना घुलाए अपनी लक्ष्मी को समुद्र- प्रातों में भेजें। एक सिविलसर्विस के लिए जितना रुपया व्यय किया जाता है, और एक साल जितने मनुष्य परीक्षा ठेने विलायत जाते हैं उतने रुपयों के यदि हमारे देश में कोई सदव्यय होने लगे तो क्या ही छानन्द का विषय हो । सिवि-


(१) अरव का रहनेवाला था । हर समय कार इतभाला, काल. हुजैद कहा करता था । झट 6 महर्षियों ने "कालयवन नाम पर दिया ।

(२) फारस का रहनेवाला था। जय कोई वस्तु चाहता था तो विदुर जा से कहता-रगे जदै म नाहम" झट से मै (मय) नाम पड़ गया

• (३) हाइड्सपार्क-जहा से सना योजाभर दूर रहती है। बंदन का एक वादा ।