पृष्ठ:निर्मला.djvu/१०

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पहला परिच्छेद
 


निठुर हो गई! अकेली छोड़ कर चली गई! बात कोई न थी, लेकिन दुखी हृदय दुखती हुई आँख है, जिसमें हवा से भी पीड़ा होती है। निर्मला बड़ी देर तक बैठी रोती रही। भाई-बहिन, माता-पिता सभी इसी भॉति मुझे भूल जायँगे, सब की आँखें फिर जायँगी! फिर शायद इन्हें देखने को भी तरस जाऊँ!

चारा में फूल खिले हुए थे। मीठी-मीठी सुगन्ध आ रही थी। चैत की शीतल, मन्द समीर चल रही थी। आकाश में तारे छिटके हुए थे। निर्मला इन्हीं शोकमय विचारों में पड़ी-पड़ी सो गई और आँख लगते ही उसका मन स्वप्न-देश में विचरने लगा। क्या देखती है कि सामने एक नदी लहरें मार रही है; और वह नदी के किनारे नाव की वाट देख रही है। सन्ध्या का समय है। अँधेरा किसी भयङ्कर जन्तु की भाँति बढ़ता चला आता है। वह घोर चिन्ता में पड़ी हुई है कि कैसे यह नदी पार होगी; कैसे घर पहुँचूँगी। रो रही है कि कहीं रात न हो जाय, नहीं तो मैं अकेली यहाँ कैसे रहूँगी। एकाएक उसे एक सुन्दर नौका घाट की ओर आती दिखाई देती है। वह खुशी से उछल पड़ती है; और ज्योंही नाव घाट पर आती है, वह उस पर चढ़ने के लिए बढ़ती है। लेकिन ज्योंही नाव के पटरे पर पैर रखना चाहती हैं, उसका मल्लाह बोल उठता है--तेरे लिए यहाँ जगह नहीं है। वह मल्लाह की खुशामद करती है, उसके पैरों पड़ती है, रोती है; लेकिन वह यह कहे जाता है--तेरे लिए यहाँ जगह नहीं है।