पृष्ठ:निर्मला.djvu/११४

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श्राठवां परिच्छेद
 

खाए-पिए चला जा रहा है और तुम लड़कों को लिए बातें कर रही हो। उसको तुम जानती नहीं हो। यह समझ लो कि वह स्कूल नहीं जा रहा है,बनवास ले रहा है,लौट कर फिर न आवेगा। वह उन लड़कों में नहीं है,जो खेल में मार भूल जाते हैं। बात उसके दिल पर पत्थर की लकीर हो जाती है।

निर्मला ने कातर स्वर में कहा-क्या करूँ;दीदी जी? वह किसी की सुनते ही नहीं। आप जरा जाकर बुला लें। आप के बुलाने से आ जायेंगे।

रुक्मिणी-आखिर हुआ क्या,जिस पर वह भागा जाता है? घर से तो उसका जी कभी उचाट न होता था। उसे तो अपने घर के सिवा और कहीं अच्छा हीन लगता था। तुम्ही ने उसे कुछ कहा होगा या उसकी कुछ शिकायत की होगी। क्यों अपने लिए काँटे बो रही हो? रानी, घर को मिट्टी में मिला कर तुम चैन से न वैठने पाओगी!

निर्मला ने रोकर कहा-मैं ने उन्हें कुछ कहा हो,तो मेरी ज़बान कट जाय। हाँ,सौतेली होने के कारण बदनाम तो हूँ ही । श्राप . के हाथ जोड़ती हूँ, जरा जाकर उन्हें बुला लाइए।

रुक्मिणी ने तीव्र स्वर में कहा- तुम क्यों नहीं बुला लाती? क्या छोटी हो जाओगी? अपना होता तो क्या इसी तरह बैठी रहती?

निर्मला की दशा उस पङ्खहीन पक्षी की सी हो रही थी, जो सर्प को अपनी ओर देख कर उड़ना चाहता है; पर उड़ नहीं