पृष्ठ:निर्मला.djvu/१३२

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दसवां परिच्छेद
 

डॉक्टर-नहीं,मर तो न जाय;पर सिर में चकर जलर आ जाय।

मन्सा-कोई ऐसी दवा भी इसमें है,जिसे पीत ही प्राण निकल जायें?

डॉक्टर-ऐसी एक-दो नहीं,कितनी ही दवाएँ हैं। यह जो शीशी देख रहे हो,इसकी एक बूंद भी पेट में चली जाय नो जान न वचे आनन-फानन में मौत हो जाय।

मन्सा-क्यों डॉक्टर साहब,जो लोग जहर खा लेते हैं,उन्हें बड़ी तकलीफ होती होगी?

डॉक्टर-सभी जहरों से तकलीफ नहीं होती। वाज़ तो ऐसे हैं कि पीते ही आदमी ठण्डा हो जाता है। यह शीशी इसी किस्म की है। इसे पीते ही आदमी वेहोश हो जाता है,फिर उसे होश नहीं आता।

मन्साराम ने सोचा-तब तो प्राण देना बहुत आसान है। फिर लोग क्यों इतना डरते हैं? यह शीशी कैसे मिलेगी? अगर दवा का नाम पूछ कर शहर के किसी दवा-करोश से लेना चाहूँ, तो वह कभी न देगा। उँह, इसके मिलने में कोई दिक्कत नहीं। यह तो मालूम हो गया कि प्राणों का अन्त बड़ी आसानी से किया जा सकता है । मन्साराम इतना प्रसन्न हुआ, मानो कोई इनाम पा गया हो। उसके दिल पर से एक वोझ सा हट गया। चिन्ता की मेघ-राशि, जो सिर पर मँडला रही थी,छिन्न-भिन्न हो गई। महीनों के बाद आज उसे मन में एक स्फूर्ति का अनुभव हुआ।