पृष्ठ:निर्मला.djvu/१३१

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निर्मला
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डॉक्टर-मैं तुम्हारी परीक्षा करना चाहता हूँ। तुम्हारी तो सूरत ही बदल गई जी,पहचाने भी नहीं जाते! यह कह कर उन्होंने मन्साराम का हाथ पकड़ लिया और छाती, पीठ,आँखें, जीभ सब बारी-बारी से देखी । तब चिन्तित होकर बोले-वकील साहब से मैं आज ही मिलूँगा। तुम्हें थाइसिस हो रहा है। सारे लक्षण उसी के हैं। मन्साराम ने बड़ी उत्सुकता से पूछा-भला कितने दिनों में काम तमाम हो जायगा;डॉक्टर साहब?

डॉक्टर-कैसी बातें करते हो जी! मैं वकील साहब से मिल कर तुम्हें किसी पहाड़ी जगह भेजने की सलाह दूंगा। ईश्वर ने चाहा तो तुम बहुत जल्द अच्छे हो जाओगे। बीमारी अभी पहले ही स्टेज में है।

मन्साराम-तब तो अभी साल-दो साल की देर मालूम होती है। मैं तो इतना इन्तजार नहीं कर सकता। सुनिए,मुझे थाइसिसवाइसिस कुछ नहीं है न कोई दूसरी शिकायत ही है। आप बाबूजी को नाहक तरदुत में न डालिएगा। इस वक्त मेरे सिर में दर्द है, कोई दवा दीजिए। कोई ऐसी दवा हो,जिससे नोंद भी आ जाय। मुझे दो रात से नींद नहीं आती।

डॉक्टर साहब ने जहरीली दवाइयों की आलमारी खोली और एक शीशी में थीड़ी सी दवा निकाल कर भन्साराम को दी। मन्साराम ने पूछा- यह तो कोई जहर है? भला कोई इसे पीले तो मर जाय.