पृष्ठ:निर्मला.djvu/१४८

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ग्यारहवाहवाँ परिच्छेद
 
कर बैठ गया;और एक धक से मुन्शी जी को चारपाई के ना दिल ढकेल कर उन्मत्त स्वर में बोला-क्यों धमकाते हैं? आप मार डालिए,मार डालिए,अभी मार डालिए!! तलवार नहीं मिलती? रस्सी का फन्दा है या वह भी नहीं? मै अपने गले में लगा लूँगा। हाय अम्मा जी, तुम कहाँ हो? यह कहते-कहते वह फिर अचेत होकर गिर पड़ा!

मुन्शी जी एक क्षण तक मन्साराम की शिथिल मुद्रा की ओर व्यथित नेत्रों से ताकते रहे; फिर सहसा उन्होंने डॉक्टर साहब का हाथ पकड़ लिया;और अत्यन्त दीनतापूर्ण आग्रह से बोले-डॉक्टर साहब,इस लड़के को बचा लीजिए-ईश्वर के लिए वचा लीजिए, नहीं मेरा सर्वनाश हो जायगा! मैं अमीर नहीं हूँ; लेकिन आप जो कुछ कहेंगे,वह हाजिर करूँगा; इसे बचा लीजिए! आप बड़े से बड़े डॉक्टरों को बुलाइए,और उनकी राय लीजिए; मैं सब खर्च दे दूंगा! इसकी यह दशा अब नहीं देखी जाती! हाय,मेरा होनहार वेटा!

डॉक्टर साहब ने करुण-स्वर में कहा-बाबू साहब,मैं आप से सत्य कहता हूँ कि मैं इनके लिए अपनी तरफ से कोई बात उठा नहीं रख रहा हूँ। अब श्राप दूसरे डॉक्टरों से सलाह लेने कहते हैं। मैं अभी डॉक्टर लहिरी, डॉक्टर भाटिया और डॉक्टर माथुर को बुलाता हूँ। विनायक शास्त्री को भी बुलाए लेता हूँ;लेकिन मैं आपको व्यर्थ का आश्वासन नहीं देना चाहता-हालत नाजुक है।