पृष्ठ:निर्मला.djvu/१७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
निर्मला
१४
 


कुछ? जहाँ कोई बात कही, बस सिर हो गए; मानो मैं घर की लौंडी हूँ, मेरा केवल रोटी और कपड़े का नाता है। जितना ही मैं दबती हूँ, तुम और भी दबाते हो। मुफ्तख़ोरे माल उड़ाएँ, कोई मुँह न खोले: शराब-कबाब में रुपये लुटें, कोई जबान न हिलाए। ये सारे काँटे मेरे बच्चों ही के सिर तो बोए जा रहे है!

उदयभानु--तो मैं क्या तुम्हारा गुलाम हूँ?

कल्याणी--तो क्या मैं तुम्हारी लौंडी हूँ?

उदयभानु--ऐसे मर्द और होंगे, जो औरतों के इशारों पर नाचते हैं।

कल्याणी--तो ऐसी स्त्रियाँ भी और होंगी, जो मर्दों की जूतियाँ सहा करती हैं।

उदयभानु--मैं कमा कर लाता हूँ; जैसे चाहूँ खर्च कर सकता हूँ। किसी को बोलने का अधिकार नहीं है।

कल्याणी--तो आप अपना घर सँभालिए। ऐसे घर को मेरा दूर ही से सलाम है, जहाँ मेरी कोई पूछ नहीं। घर में तुम्हारा जितना अधिकार है, उतना ही मेरा भी। इससे जो भर भी कम नहीं। अगर तुम अपने मन के राजा हो, तो मैं भी अपने मन की रानी हूँ। तुम्हारा घर तुम्हें मुबारक रहे, मेरे लिए पेट की रोटियों की कमी नहीं है । तुम्हारे बच्चे हैं; मारो या जिलाओ। न आँखों से देखूगी, न पीड़ा होगी। आँखें फूटीं, पीर गई!

उदयभानु--क्या तुम समझती हो कि तुम न सँभालोगी, वो