पृष्ठ:निर्मला.djvu/१८

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दूसरा परिच्छेद
 


मेरा घर ही न सँभलेगा? मैं अकेले ऐसे-ऐसे दस घर सँभाल सकता हूँ।

कल्याणी--कौन! अगर आज के महीनवें दिन मिट्टी में न मिल जाय, तो कहना कोई कहती थी।

यह कहते-कहते कल्याणी का चेहरा तमतमा उठा। वह झमक कर उठी; और कमरे से द्वार की ओर चली। वकील साहब मुक़दमों में तो खूब मीन-मेख निकालते थे;लेकिन खियों के स्वभाव का उन्हें कुछ यों ही सा ज्ञान था। यही एक ऐसी विद्या है, जिसमें आदमी बूढ़ा होने पर भी कोरा रह जाता है। अगर अब भी वह नरम पड़ जाते; और कल्याणी का हाथ पकड़ कर विठा लेते, तो शायद वह रुक जाती, लेकिन आप से यह तो नहो सका; उलटे चलते-चलाते एक और चर्का दिया।

बोले--मैके का घमण्ड होगा।

कल्याणी ने द्वार पर रुक कर पति की ओर लाल-लाल नेत्रों से देखा; और बफर कर बोली--मैके वाले मेरी तक़दीर के साथी नहीं हैं; और न मैं इतनी नीच हूँ कि उनकी रोटियों पर जा पडूँ।

उदयभानु--तब कहाँ जा रही हो?

कल्याणी--तुम यह पूछने वाले कौन होते हो? ईश्वर की सृष्टि में असंख्य प्राणियों के लिए जगह है, क्या मेरे ही लिए जगह नहीं है?

यह कह कर कल्याणी कमरे के बाहर निकल गई। आँगन में