पृष्ठ:निर्मला.djvu/१८७

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निर्मला १५४ दिन से सीधे हो गए । अब तो उनकी दशा पर मुझे दया आती है । पुत्र-शोक उनके प्राण लेकरं छोड़ेगा । मुझ पर सन्देह करके मेरे साथ जो अन्याय किया है, अब उसका प्रतिशोध कर रहे हैं। अब की उनकी सूरत देख कर तू डर जायगी। बूढ़े बाबा हो गए हैं । कमर भी कुछ मुक चली है। कृष्णा-बुड्ढे लोग इतने शकी क्यों होते हैं; वहिन ? निर्मला-यह जाकर बुड्ढों से पूछ ! कृष्णा-मैं तो समझती हूँ, उनके दिल में हरदम एक चोर सा बैठा रहता होगा कि मैं इस युवती को प्रसन्न नहीं रख सकता। इसीलिए जरा-जरा सी बात पर उन्हें शक होने लगता है । निर्मला-जानती तो है, फिर मुझसे क्यों पूछती है ? कृष्णा-इसीलिए बेचारा स्त्री से दवता भी होगा। देखने वाले समझते होंगे कि यह बहुत प्रेम करता है। निर्मला तूने इतने ही दिनों में इतनी बातें कहाँ से सीख ली ? इन बातों को जाने दे, बता तुझे अपना वर पसन्द है ? उसकी तस्वीर तो देखी होगी? कृष्णा-हाँ, आई तो थी। लाऊँ, देखोगी ? एक क्षण में कृष्णा ने तस्वीर लाकर निर्मला के हाथ में रख दी। निर्मला ने मुस्करा कर कहा-तू बड़ी भाग्यवान है ! कृष्णा-अम्माँ जी ने भी बहुत पसन्द किया । निर्मला-तुझे पसन्द है कि नहीं, सो कह ; दूसरों की बात न चला।