पृष्ठ:निर्मला.djvu/१९३

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निर्मला
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विवाह तो करना नहीं, जरा सा बोलने में क्या हानि है? डॉक्टर साहन यहाँ होते तो मैं तुन्हें आज्ञा दिला देती!

सुश-जो लोर वृदय के उद्धार होते हैं,क्या चरित्र के भी अच्छे होते हैं? पराई बी को घूरने में तो किसी मई को सङ्कोच नहीं होता।

निर्मला-अच्छा न बोलना, मैं ही बातें कर लूंगी,घूर लेंगे जितना उनने यूरत बनेगा; बस,अब तो राजी हुई।

इतने में कृष्ण आकर बैठ गई। निर्मला ने मुस्करा कर कहा जब बत्ता कृष्णा, तेरा मन इस वक्त क्यों उचाट होरहा है?

कृष्णा-जीजा जी बुला रहे हैं,पहले जाकर सुन आओ, पछि गपे लड़ाना। बहुत बिगड़ रहे हैं।

निर्मला क्या है, तूने कुछ पूछा नहीं?

कृशा-इछ बीमार ने नाल्म होते हैं। बहुत दुबले हो गए हैं।

निर्मला तो जरा बैठ कर उनका मन बहला देती, यहाँ दौड़ी क्या चलो आई। यह कहो ईश्वर ने कृपा की, नहीं तो ऐसा ही पुरुष तुने भी मिलता! जरा बैठ कर बातें तो करो। बुड्ढे वाते बड़ी लच्छेदार करते हैं। जबान इतने डीगियल नहीं होते!

कृष्णा नहीं बहिन,तुम जाओ; मुझसे दो वहाँ नहीं बैठा जाता।

निर्मला चली गई, तो सुधा ने कृष्णा से कहा-अब तो बारात आ गई होगी। द्वार-यूजा क्यों नहीं होती?