पृष्ठ:निर्मला.djvu/२११

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निर्मला
२०८
 

यह कहते-कहते सुधा के आँसू फिर उमड़ आए। डॉक्टर सिन्हा ने उसे सीने से लगा कर करुणा से काँपती हुई आवाज में कहा-प्रिये, आज तक कोई ऐसा बालक या वृद्ध न मरा होगा, जिसके घर वालों को उसके दवा-दर्पन की लालसा पूरी हो गई हो!

सुधा-निर्मला ने मेरी बड़ी मदद की! मैं तो एकाध झपकी ले भी लेती थी; पर उनकी आँखें नहीं झपकी। रात-रात लिए बैठी या टहलाती रहती थी। उसके एहसान कभी न भूलूंगी। क्या तुम आज ही जा रहे हो?

डॉक्टर-हाँ, छुट्टी लेने का मौका न था। सिविल-सर्जन शिकार खेलने गया हुआ था।

सुधा-यह सब हमेशा शिकार ही खेला करते हैं?

डॉक्टर-राजाओं का और काम ही क्या है?

सुधा-मैं तो आज न जाने दूंगी।

डॉक्टर-जी तो मेरा भी नहीं चाहता। सुधा--तो मत जाओ; तार दे दो! मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगी। निर्मला को भी लेती चलूँगी।।

'सुधा वहाँ से लौटी, तो उसके हृदय का बोझ हलका हो गया था! पति की प्रेमपूर्ण कोमल वाणी ने उसके सारे शोक और सन्ताप को हरण कर लिया था। प्रेम में असीम विश्वास है, असीम धैर्य है। और असीम बल है!!