पृष्ठ:निर्मला.djvu/२४२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
२३९
वीसवां परिच्छेद
 

मुन्शी जी कचहरी से लौटे,तो बहुत घबराए हुए थे। सिर थाम कर चारपाई पर बैठ गए।

निर्मला ने कहा-कपड़े क्यों नहीं उतारते? आज तो और दिनों से देर हो गई है।

मुन्शी जी क्या कपड़े उतारूँ? तुमने कुछ सुना?

निर्मला-क्या बात है? मैं ने तो कुछ नहीं सुनी।

मुन्शी जी-माल बरामद हो गया। अब जिया का बचना मुश्किल है।

निर्मला को आश्चर्य नहीं हुआ। उसके चेहरे से ऐसा जान पड़ा मानो उसे यह बात मालूम थी। बोली-मैं तो पहले ही कह रही थी कि थाने में इत्तला मत कीजिए।

मुन्शी जी-तुम्हें जिया पर शक था?

निर्मला-शक क्यों नहीं था,मैंने उन्हें अपने कमरे से निकलते देखा था।

मुन्शी जी-फिर तुमने मुझसे क्यों न कह दिया?

निर्मला यह बात मेरे कहने की न थी। आपके दिल में जरूर ख्याल आता कि यह ईर्ष्या वश आक्षेप लगा रही है। कहिए, यह ख्याल होता या नहीं। झूठ न बोलिएगा।

मुन्शी जी-सम्भव है, मैं इन्कार नहीं कर सकता। उस दशा में भी तुम्हें मुझसे कह देना चाहिए था। रिपोर्ट की नौवत न आती। तुमने अपनी नेकनामी की तो फिक्र की, यह न सोचा कि परिणाम