पृष्ठ:निर्मला.djvu/२४३

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निर्मला
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क्या होगा। मैं अभी थाने से चला आता हूँ। अलायार खाँ आता ही होगा।

निर्मला ने हताश होकर पूछा-फिर अब?

मुन्शी जी ने आकाश की ओर ताकते हुए कहा-फिर जैसी भगवान की इच्छा। हजार-दो हजार रुपए रिशवत देने के लिए होते,तो शायद मामला दब जाता; पर मेरी हालत तो तुम जानती हो। तक़दीर खोटी है; और कुछ नहीं! पाप तो मैंने किए हैं, दण्ड कौन भोगेगा? एक लड़का था उसकी वह दशा हुई, दूसरे की यह दशा हो रही है। नालायक था, गुस्ताख था, कामचोर था; पर था तो अपना ही लड़का, कभी न कभी चेत ही जाता। यह चोट अब न सही जायगी।

निर्मला-अगर कुछ दे-दिला कर जान बच सके, तो मैं रुपए का प्रबन्ध कर दूँ?

मुन्शी जी कर सकती हो? कितने रुपये दे सकती हो ? -

निर्मला-कितना दरकार होगा?

मुन्शी जी-एक हजार से कम में तो शायद बातचीत न हो सके। मैंने एक मुकदमे में उससे १०००) लिए थे। वह कसर आज निकालेगा।

निर्मला-हो जायगा। आप अभी थाने जाइए।

मुन्शी जी को थाने में बड़ी देर लगी। एकान्त में बातचीत करने का बहुत देर में मौका मिला।अलायार खाँ पुराना घाघ था बड़ी मुश्किल से अण्टी पर चढ़ा। पाँच सौ रुपए लेकर भी एहसान